कहानी "अमानत" : पहला अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 1 — एक साया, एक रोशनी
बिस्मिल्लाहपुर की तंग गलियों में जब सूरज डूबता था, तब रौशनी से ज़्यादा अंधेरे में उम्मीद दिखती थी। उन गलियों में एक नाम ऐसा था, जिसे लोग डर से नहीं, दुआओं से याद करते थे — अब्दुल वाहिद खान।
लंबा कद, चेहरे पर सफेद दाढ़ी की लकीरें, आंखों में सुकून और सीने में तुफान। अब्दुल हर नमाज़ वक्त पर मस्जिद में जाता, मगर लौटते वक्त अक्सर रुक जाता था—कभी किसी बेसहारा बच्चे को खाना खिलाने, कभी किसी बेवा की दवाई लाने, तो कभी किसी अनजान का जनाज़ा उठाने।
लोग कहते थे — "अब्दुल माफिया है।"
कुछ कहते — "अब्दुल फकीर है।"
मगर अब्दुल खुद को सिर्फ एक चीज़ मानता था — एक मुत्तकी मुसलमान और इंसानियत का रखवाला।
उसे मालूम था कि दुनिया सफेद और काली नहीं होती — बहुत से लोग सफेद कपड़े पहनकर काले काम करते हैं, और बहुत से काले लिबास में रौशनी का बोझ ढोते हैं।
एक रात की बात है। मस्जिद से लौटते वक़्त रहमत अली, उसका नौकर और साया, धीरे से उसके पास आया।
“हुज़ूर,” वह फुसफुसाया, “अफजल ने फिर कोशिश की है... इस बार छब्बीस लड़कियाँ... कंटेनर में बंद... शहर से बाहर निकल रही हैं।”
अब्दुल की पेशानी पर लकीरें गहराने लगीं।
"छब्बीस ज़िंदगियाँ… छब्बीस अमानतें," उसने खुद से कहा।
उसके लिए हर लड़की, हर बच्चा, हर मासूम चेहरा — एक अमानत थी। और अमानत की हिफाज़त सिर्फ एक फर्ज़ नहीं, एक इबादत होती है।
उस रात अब्दुल ने ना कोई नमाज़ छोड़ी, ना कोई तैयारी।
उसने अपनी लकड़ी की छड़ी उठाई, जो उसकी एक टांग की कमी पूरी करती थी, और रहमत अली के साथ निकल पड़ा — अंधेरे के सीने को चीरने।
किसी ने पूछा — "क्यों करते हो ये सब?"
उसने सिर्फ इतना कहा —
"क्योंकि अगर एक इंसान भी मेरी वजह से बच जाए… तो शायद मेरा रब मेरी बाकी खामियों को माफ़ कर देगा।"
उस रात बिस्मिल्लाहपुर की सड़कों पर सिर्फ गाड़ियों के हॉर्न नहीं गूंजे — वहां गूंजा था एक नाम, एक ईमान, एक आवाज़—
"अल्लाह हू अकबर!"