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कहानी : "चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें" : शेख जमीरुल हक खान चौधरी


अध्याय 8 और अंतिम अध्याय— सुकून की आखिरी शाम
गेस्ट हाउस “सुकून” अब सिर्फ एक जगह नहीं रहा था, वो एक एहसास बन चुका था—ऐसा ठिकाना जहाँ टूटे लोग खुद को जोड़ने आते, और अधूरी कहानियाँ नई शुरुआत पातीं।
आरव और मेहर का रिश्ता अब किसी नाम का मोहताज नहीं था। वो साथ थे, और यही काफी था।
पर किस्मत को कहानियाँ अधूरी छोड़ना पसंद नहीं।
एक सुबह, मेहर की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उसे तेज़ बुखार और लगातार थकावट महसूस होने लगी। आरव उसे नज़दीकी शहर के अस्पताल ले गया।
डॉक्टरों ने कई जाँचें कीं… और फिर कुछ देर बाद एक रिपोर्ट ने उस ठहरे हुए सुकून में उथल-पुथल मचा दी।
मेहर को ब्लड कैंसर था—तीसरे स्टेज का।
आरव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वो हफ्तों से सोच रहा था कि अब सब ठीक हो गया है… लेकिन ज़िंदगी ने फिर वही मोड़ दिखा दिया, जिससे दोनों भागकर यहाँ तक आए थे।
हॉस्पिटल के बेड पर लेटी मेहर ने मुस्कुराकर कहा,
"मैं हारना नहीं चाहती, आरव… लेकिन अगर हार भी गई, तो भी मुझे अफ़सोस नहीं होगा।"
"क्यों?" उसकी आँखें भर आईं।
"क्योंकि तुमसे मिलकर मुझे वो प्यार मिला, जो इश्क़ से भी ज़्यादा गहरा था… वो सुकून, जो मौत से भी ऊपर है।"
आरव ने उसका हाथ थामा और वादा किया,
"मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा।"
इलाज शुरू हुआ। कीमोथेरेपी के दर्द से मेहर अक्सर टूट जाती, लेकिन आरव हर बार उसे उसी कविता की लाइनें सुनाकर हौसला देता:
चलो दूर चलें उस भीड़ से,
जहाँ नामों से पहचान मिलती है...
समय बीतता गया। मेहर की हालत उतार-चढ़ाव भरी रही। कई बार डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ी, लेकिन आरव ने नहीं।
और फिर एक दिन चमत्कार हुआ।
छह महीने की लगातार लड़ाई के बाद डॉक्टरों ने कहा—“मेहर अब खतरे से बाहर है।”
आरव की आँखों से बहते आँसू इस बार तकलीफ़ के नहीं, राहत के थे।
वापसी "सुकून" में हुई।
गेस्ट हाउस अब पहले से ज्यादा गुलजार था। मेहर ने वहाँ एक छोटी लाइब्रेरी शुरू की, जहाँ आने वाले हर मेहमान को अपनी कहानी लिखने का मौका मिलता।
आरव ने किताब लिखी—"चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें"।
कई पब्लिशर्स ने उसे रिजेक्ट किया, लेकिन एक दिन, वो किताब बेस्टसेलर बन गई।
अंत में, मेहर और आरव ने मिलकर गेस्ट हाउस की दीवार पर एक पंक्ति उकेरी—
"जहाँ इश्क़ टूटे नहीं, वहाँ सुकून बसता है..."

समाप्त

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