कहानी : "चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें" : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 7 — ठहराव की शुरुआत
ज़ोया के लौट जाने के बाद आरव और मेहर की ज़िंदगी फिर उसी लय में लौट आई, लेकिन अब एक बदलाव महसूस होने लगा था—इस बार वो ठहराव अस्थायी नहीं, स्थायी लगने लगा।
आरव हर सुबह मेहर के लिए चाय बनाता और खामोशी में उसे पास बैठाकर पिलाता। मेहर अब खुलकर हँसने लगी थी, और आरव की आंखों में उस मुस्कान का अक्स झलकने लगा जो सालों पहले खो गया था।
एक दिन दोनों पहाड़ी की चोटी पर टहलने निकले। ठंडी हवा उनके चेहरों से टकरा रही थी और धूप उनके कंधों पर हल्के से टिक गई थी।
मेहर ने एक कागज़ निकाला और आरव की तरफ बढ़ाया।
"ये क्या है?" आरव ने पूछा।
"मेरी अधूरी कविता… जो अब शायद पूरी हो सकती है।"
आरव ने पढ़ना शुरू किया:
*चलो दूर चलें उस भीड़ से,
जहां नामों से पहचान मिलती है,
चलो वहाँ जहाँ दिलों की आवाज़
खामोशियों में सुनाई देती है…*
आरव रुका, उसकी आँखें भीगने लगीं। "ये तो... हमारी कहानी है।"
मेहर ने सिर झुकाया, "हाँ। पर अब ये अधूरी नहीं रहनी चाहिए।"
वो चुपचाप उसकी ओर देखता रहा। पहाड़ों के उस पार सूरज ढल रहा था और मेहर की आँखों में उम्मीद उग रही थी।
"क्या तुम यहीं रुक जाना चाहती हो?" आरव ने पूछा।
"हाँ। अगर तुम्हारे साथ ठहर सकूँ।"
आरव ने उसका हाथ थामा और कहा,
"फिर चलो, एक नई ज़िंदगी शुरू करते हैं—इश्क़ से दूर नहीं, बल्कि ऐसे इश्क़ के साथ जो सुकून देता है, तकलीफ़ नहीं।"
उस शाम दोनों ने मिलकर उस गेस्ट हाउस के बाहर एक छोटी सी नेमप्लेट टांगी—जिस पर लिखा था:
"सुकून — दो टूटे दिलों का आशियाना"