कहानी : "चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें" : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 6 — गुज़रे कल की दस्तक
गेस्ट हाउस में रहते हुए हफ्ता बीत गया था। आरव और मेहर दोनों की दिनचर्या अब कुछ सुकून भरी हो चली थी। सुबह की चाय, पहाड़ी रास्तों पर लंबी सैर, और रात को अलाव के पास बैठकर बीते कल की बातों में खुद को थोड़ा-थोड़ा हल्का करना—ये सब अब उनके बीच की खामोशी को भरने लगे थे।
लेकिन सुकून की इन दीवारों के पीछे कुछ ऐसा था जो अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था—अतीत।
एक शाम, जब आरव पास के कैफे से किताबें लेकर लौटा, तो गेस्ट हाउस के बाहर एक जानी-पहचानी आवाज़ ने उसके कदम रोक दिए।
"आरव?"
आरव ने चौंक कर देखा। सामने खड़ी थी ज़ोया।
वो ही ज़ोया... जो उसे बिन कहे छोड़ गई थी।
कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। ज़ोया की आँखें नम थीं और चेहरे पर पछतावे की परछाईं थी।
"तुम यहाँ?" आरव ने बस इतना पूछा।
"मैं बहुत देर से ढूंढ रही थी तुम्हें... और शायद अब जाकर तुम्हें खोया हुआ महसूस हो रहा है।"
इससे पहले कि आरव कुछ कह पाता, पीछे से मेहर की आवाज़ आई, "आरव, तुम मिल गए? मैं—"
वो वहीं रुक गई, जब उसकी नजर ज़ोया पर पड़ी। तीनों के बीच कुछ पल के लिए अजीब सी ख़ामोशी छा गई।
ज़ोया ने मेहर को देखा और पूछा, "तुम?"
"मैं... वो जो आरव के आज का हिस्सा है," मेहर ने बिना झिझक कहा, "और तुम शायद उसका बीता कल हो।"
आरव को समझ नहीं आ रहा था कि किसे देखे, क्या कहे। ज़ोया ने उसकी तरफ बढ़कर कहा, "क्या एक आखिरी मौका नहीं दे सकते?"
आरव की नज़रें मेहर की तरफ मुड़ीं—उसकी आँखों में न कोई इल्तिजा थी, न कोई मजबूरी। बस एक सच्चाई थी, जो चुपचाप कह रही थी, "चुनाव तुम्हारा है, मैं जबरदस्ती नहीं।"
आरव ने गहरी साँस ली, और धीमे से कहा,
"मैं इश्क़ की उस दुनिया से बहुत दूर आ चुका हूँ ज़ोया… और अब मैं वहीं रहना चाहता हूँ, जहाँ सुकून है।"
ज़ोया की आँखों से आँसू गिरने लगे। वो चुपचाप मुड़ी और वापस चली गई—बिना कोई और सवाल किए।
मेहर कुछ नहीं बोली। वो सिर्फ पास आकर उसके बगल में बैठ गई।
आरव ने उसका हाथ थामा और कहा, "कुछ अधूरे लोग सिर्फ सबक बनकर आते हैं… और कुछ लोग सुकून बनकर ठहर जाते हैं।"
मेहर की आंखों में अब कोई सवाल नहीं था। सिर्फ एक यकीन था।