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कहानी: "चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें" : शेख जमीरुल हक खान चौधरी


अध्याय 5 — सुकून के साए में
सड़क अब पहाड़ियों की ओर मुड़ चुकी थी। रास्ते दोनों ओर से देवदार के पेड़ों से ढंके थे और हवा में ठंडक थी, लेकिन दिलों में कुछ गर्माहट उतरने लगी थी।
आरव ने गाड़ी एक छोटे से पहाड़ी कस्बे की सीमा पर रोकी। सामने एक पुराना लकड़ी का गेस्ट हाउस था—छोटा, शांत और भीड़-भाड़ से कोसों दूर।
"यही जगह ठीक है," मेहर ने कहा, मानो किसी ने उसके दिल की बात कह दी हो।
गेस्ट हाउस का नाम था — “सुकून”।
दरवाज़ा एक बुज़ुर्ग आदमी ने खोला, जिनकी आँखों में अनुभव और चेहरे पर अपनापन था। उन्होंने दोनों को देखा और मुस्कुरा कर कहा, "लगता है आप लोग भी खुद से भागकर यहाँ आए हैं।"
आरव मुस्कुरा पड़ा, "हाँ... पर शायद अब भागना नहीं, रुकना चाहते हैं।"
कमरे में दाखिल होते ही मेहर ने खिड़की खोली। सामने धुंध से ढकी घाटी थी और आसमान पर तितर-बितर बादल। वो गहरी सांस लेकर बोली, "यहाँ वक़्त भी शायद धीरे चलता है…"
आरव पास की टेबल पर बैठा और अपनी किताबें खोल लीं, लेकिन अब वो पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि खुद को थोड़ा और पहचानने के लिए खोला करता था।
शाम होते-होते, दोनों ने बाहर की ढलान पर बैठकर सूरज को पहाड़ियों में डूबते देखा। कोई बात नहीं हुई, फिर भी मन शांत था।
"पता है," मेहर बोली, "कभी-कभी सुकून किसी इंसान की शक्ल में भी आ सकता है…"
आरव ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर हल्की धूप पड़ी थी और आँखों में वो चमक जो कभी गुम हो गई थी।
"क्या मैं वो सुकून बन सकता हूँ?" आरव ने हौले से पूछा।
मेहर कुछ पल चुप रही, फिर मुस्कुरा कर बोली, "शायद तुम पहले ही बन चुके हो…"
उस रात दोनों ने अलाव जलाया, और पुराने ज़ख्मों की राख को उसमें डाल दिया। वे बोलते रहे, हँसते रहे, और हर उस चीज़ को धीरे-धीरे पीछे छोड़ने लगे जो उन्हें तोड़ती थी।
शायद इश्क़ की दुनिया से दूर, कहीं और भी ज़िंदगी होती है।
जहाँ इश्क़ बर्बादी नहीं, राहत बनता है।

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