कहानी : "चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें" : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 4 — सफर अधूरे दिलों का
सुबह की पहली किरण कमरे की खिड़की से झांक रही थी। आरव और मेहर दोनों जाग चुके थे, लेकिन इस बार उनकी आंखों में नींद से ज़्यादा एक फैसला था।
"क्या तुम सच में चलना चाहती हो?" आरव ने पूछा।
"हाँ," मेहर ने धीरे से सिर हिलाया, "इस शहर से, इन यादों से... खुद से दूर कहीं।"
आरव ने पहली बार महसूस किया कि उसका दिल डर नहीं रहा था। बल्कि एक हल्की सी राहत महसूस हो रही थी—जैसे किसी बोझ से आज़ादी मिलने वाली हो।
दोनों ने ज़्यादा सामान नहीं लिया। कुछ कपड़े, एक कैमरा, मेहर की डायरी और आरव की किताबों से भरी एक पुरानी थैली। गाड़ी की चाबी घुमाते हुए आरव बोला, "मंज़िल तय नहीं है, पर रास्ता सच्चा लगे तो मंज़िल खुद मिल जाएगी।"
मेहर मुस्कुरा पड़ी, "हम दोनों ही तो खुद को ढूंढने निकले हैं, मंज़िल नहीं—बस एक सुकून।"
सड़कें लंबी थीं, लेकिन खामोश नहीं। मौसम ने जैसे उनका साथ देने की ठान ली थी—ठंडी हवा, हल्की धूप और रेडियो पर बजता एक पुराना गीत।
"कभी अलविदा ना कहना..."
अचानक एक मोड़ पर गाड़ी रुकी। सामने एक छोटा सा ढाबा था, और उसके बाहर कुछ बच्चे हँसते खेलते दिख रहे थे।
"रुको, मैं नीचे जाना चाहती हूँ," मेहर बोली।
आरव ने गाड़ी किनारे लगाई। मेहर बच्चों के पास गई, उनके साथ बैठी, बातें की, और अपनी डायरी से एक पेन निकाल कर एक लड़की को दे दिया।
आरव दूर से देख रहा था—मेहर के चेहरे पर वो मुस्कान लौट आई थी जो शायद बरसों से खो गई थी।
"तुम्हें बच्चों से प्यार है?" आरव ने पूछा जब वह वापस आई।
"हाँ... उनमें कोई फरेब नहीं होता। बस सच्चा हँसना आता है। और मुझे अब सच्चाई की ही तलाश है।"
"तो चलो, उस सच्चाई की ओर एक और मील चलें।"
गाड़ी फिर चल पड़ी थी। रास्ता लंबा था, लेकिन अब दोनों को शिकायत नहीं थी। शायद क्योंकि अब वो साथ थे।