कहानी : "चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें" : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 3 — बेमंज़िल राहें
रात गहराती जा रही थी। खिड़की के बाहर अंधेरा पसरा था, लेकिन आरव और मेहर के भीतर कुछ जगने लगा था—एक अधूरी-सी उम्मीद, एक अनकही-सी हमदर्दी।
आरव ने दो कप चाय बनाई। पहली बार किसी अजनबी के लिए कुछ बनाते वक़्त उसके हाथ नहीं काँपे। चाय का प्याला मेहर को थमाते हुए वह बोला, "यहाँ कोई सवाल नहीं होंगे... सिर्फ खामोशियाँ होंगी।"
मेहर हल्के से मुस्कुराई, "शुक्रिया... शायद मुझे यही चाहिए था।"
दोनों चाय की चुस्कियों के बीच उस खामोशी को महसूस कर रहे थे, जो अक्सर शोर से ज़्यादा कह जाती है।
"कभी कभी लगता है कि हमें वही लोग सबसे गहरा ज़ख्म देते हैं, जिन्हें हमने सबसे ज्यादा चाहा होता है," आरव ने पहली बार खुलकर कुछ कहा।
"और वही लोग हमें जीने की वजह भी बनते हैं," मेहर ने जवाब दिया।
कुछ पल बाद मेहर ने पर्स से एक पुरानी तस्वीर निकाली—एक मुस्कुराता हुआ लड़का और एक छोटी सी लड़की। "यह मेरा भाई था, इहान। मेरे लिए दुनिया का सबसे प्यारा इंसान।"
"था?" आरव ने पूछा।
"हां... अब नहीं है। एक एक्सीडेंट में चला गया। उसके बाद... सब बदल गया। घर, रिश्ते, मैं खुद..."
आरव ने कुछ नहीं कहा। उसने बस तस्वीर को देखा और महसूस किया कि इस लड़की की मुस्कुराहट के पीछे कितनी चीखें दबी हुई हैं।
"शायद हम दोनों ही किसी अपने को खोकर, खुद से दूर हो गए हैं," उसने कहा।
मेहर ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। उनमें एक अजीब सी पहचान थी—जैसे दोनों एक ही किस्म की दरार से बने हों।
"चलो कहीं चलें," मेहर ने अचानक कहा।
"कहाँ?"
"जहाँ ये अतीत पीछा न कर सके।"
आरव ने खिड़की के बाहर देखा—सड़कें भीगी थीं, रात चुप थी और दिल... पहली बार हल्का।
"ठीक है," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो, इश्क़ की दुनिया से दूर चलें…"