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कहानी: चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें : शेख जमीरुल हक खान चौधरी


अध्याय 2 — कौन थी वो?
कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी। बारिश अब थम चुकी थी, लेकिन आरव का दिल अब भी बूँदों की तरह गिरता महसूस हो रहा था।
वो लड़की जो सामने खड़ी थी, उसके होंठ काँप रहे थे और आँखें जैसे कोई दास्तान कह रही थीं।
"मैं मेहर हूँ," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "और मुझे नहीं पता मैं यहाँ क्यों आई हूँ... बस कदम खुद-ब-खुद खींच लाए।"
आरव चुपचाप उसे देखता रहा। न उसने सवाल किया, न विरोध। बस इतना कहा, "भीतर आ जाओ।"
मेहर ने कमरे में कदम रखा। उसकी आँखें दीवारों पर घूमीं, मानो किसी भूली हुई तस्वीर को ढूँढ रही हों। फिर उसकी नज़र उस डायरी पर पड़ी जो मेज़ पर खुली हुई थी।
"ये... ज़ोया?" उसने नाम पढ़ा।
आरव की आँखों में एक चुभती हुई चमक उभरी, "हाँ। वो कभी मेरी ज़िंदगी थी।"
मेहर कुछ नहीं बोली। बस एक कुर्सी पर बैठ गई और हल्की मुस्कान के साथ बोली, "अजीब है ना, कुछ लोग हमें छोड़कर चले जाते हैं, लेकिन उनके हिस्से की जगह खाली ही रह जाती है।"
आरव ने सिर झुकाया। उसे एहसास हुआ कि यह लड़की अजनबी होते हुए भी उसके दर्द को समझ रही थी। शायद इसलिए क्योंकि उसके भीतर भी कोई टूटी हुई कहानी थी।
"क्या तुम भी किसी से भाग कर आई हो?" उसने पूछा।
मेहर ने पल भर चुप रहकर जवाब दिया, "हाँ। मगर शायद मैं खुद से ही भाग रही हूँ…"
कमरे में फिर सन्नाटा फैल गया, लेकिन इस बार वह बोझिल नहीं था। उसमें एक सुकून था—जैसे दो टूटी रूहें एक-दूसरे की दरारों में पनाह ढूंढ रही हों।
शायद इश्क़ की दुनिया से दूर जाने की शुरुआत यहीं से हो रही थी… दो अनजानों की एक नयी कहानी के साथ।

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