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कहानी: चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें शेख जमीरुल हक खान चौधरी


अध्याय 1 — बिखरे पल
बारिश की बूंदें धीमे-धीमे खिड़की के कांच से टकरा रही थीं। कमरे में हल्की रौशनी थी और एक कोने में बैठा था आरव, जो आज फिर उसी पुरानी डायरी के पन्नों में डूबा था। उस डायरी में हर एक लफ्ज़, हर एक एहसास, ज़ोया के नाम था।
ज़ोया, जो कभी उसकी दुनिया हुआ करती थी।
"इश्क़... शायद सबसे हसीन और सबसे जहरीला एहसास है।" उसने मन ही मन सोचा।
वक़्त के साथ बहुत कुछ बदला था। आरव की आँखों में अब न वो चमक थी, न दिल में वो उम्मीद। ज़ोया चली गई थी—बिना कुछ कहे, बिना पीछे मुड़े। और आरव वहीं रुक गया था, जहाँ से सब कुछ शुरू हुआ था।
"चल इश्क़ की दुनिया से दूर चलें," उसने एक दिन लिखा था उस डायरी में, "क्योंकि यहाँ सिर्फ दिल टूटते हैं और सपने मरते हैं।"
लेकिन क्या वाकई इश्क़ से दूर जाया जा सकता है?
अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। आरव ने चौंक कर दरवाज़ा खोला। सामने खड़ी थी एक अजनबी—गीले बाल, काँपते होंठ और आँखों में जाने-पहचाने से सवाल।
"क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" उसने पूछा।
आरव कुछ पल चुप रहा, फिर दरवाज़ा खोल दिया।
शायद कहानी फिर से शुरू होने वाली थी…
या फिर एक अधूरी कहानी को आखिरी मुकाम मिलने वाला था।

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