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कविता ज़िन्दगी से जब-जब मुहब्बत होती है शेख जमीरुल हक खान चौधरी


ज़िन्दगी से जब-जब मुहब्बत होती है,
किसी ख़ामोश शाम से इबादत होती है।
काँटों के बीच भी जब फूल मुस्काते हैं,
तब समझो दिल को फिर राहत होती है।

ज़िन्दगी से जब-जब मुहब्बत होती है,
दर्द भी अपना-सा लगने लगता है,
जो आँसू कल तक थे बेगाने,
आज वही आँखों का सहारा बनते हैं।

थकी हुई साँसों में जब उम्मीद बसती है,
हर हार में कोई जीत छुपी लगती है,
अँधेरों से डरकर जो ठहर जाते हैं,
उन्हें क्या पता—सहर यूँ ही नहीं मिलती है।

ज़िन्दगी से जब-जब मुहब्बत होती है,
वक़्त की सख़्ती भी नरम लगती है,
छूटे हुए ख़्वाब, टूटी हुई राहें,
फिर से चलने की क़ुव्वत देती हैं।

कभी माँ की दुआ में, कभी दोस्त की हँसी में,
कभी किसी अजनबी के एहसान में,
ज़िन्दगी अपने होने का सबूत देती है,
छोटी-छोटी बातों की पहचान में।

ज़िन्दगी से जब-जब मुहब्बत होती है,
ख़ुद से मिलने की आदत होती है,
आईने में जो चेहरा अनदेखा था,
उसी से सबसे गहरी चाहत होती है।

न वो मुकम्मल होती है, न आसान,
फिर भी उसी में सुकून तलाशते हैं,
क्योंकि हर साँस ये कहती है चुपके से—
“गिर कर संभलना ही जीने का नाम है।”

ज़िन्दगी से जब-जब मुहब्बत होती है,
मौत भी डराना छोड़ देती है,
हर पल को जी लेने की जिद में,
रूह ख़ुदा से क़रीब हो जाती है।

और आख़िर में बस इतना ही कहूँ—
अगर जीना है तो इसे शिद्दत से जियो,
क्योंकि ज़िन्दगी से जब-जब मुहब्बत होती है,
ज़िन्दगी भी इंसान से मुहब्बत करती है।

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