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कविता वह सुबह कब आयेगी शेख जमीरुल हक खान चौधरी



वह सुबह कब आयेगी,
जब देश हमारा फिर विश्व ज्ञान गुरु कहलायेगा।
जब वेदों की ध्वनि और विज्ञान की ज्योति,
एक साथ मानवता का पथ दिखायेगी।

जब गुरुकुल की परंपरा और आधुनिक प्रयोगशाला,
कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ेंगी।
जब प्रश्न पूछना अपराध नहीं,
और सोचने की आज़ादी सम्मान कहलायेगी।

जब शिक्षा केवल नौकरी नहीं,
चरित्र निर्माण का माध्यम बनेगी।
जब शिक्षक फिर से दीपक होंगे,
और छात्र सच्चे साधक कहलायेंगे।

जब भाषा की दीवारें गिरेंगी,
और ज्ञान का कोई वर्ग नहीं होगा।
जब गाँव का बच्चा भी कह सकेगा गर्व से,
मेरी बुद्धि किसी से कम नहीं होगी।

जब नकल नहीं, नवाचार पूजे जायेंगे,
और श्रम को फिर से गरिमा मिलेगी।
जब इतिहास से सीख लेकर,
भविष्य की नींव ईमानदारी से रखी जायेगी।

जब सत्ता नहीं, सेवा महान होगी,
और नीति केवल पुस्तकों में नहीं रहेगी।
जब विज्ञान मानवता का सेवक बनेगा,
और तकनीक करुणा से जुड़ी होगी।

वह सुबह आयेगी—ज़रूर आयेगी,
यदि हम स्वयं दीप बनना सीख जायेंगे।

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