संविधान की सारी शक्तियाँ हमारे वोट से ही निर्धारित की जाती हैं – सवर्ण मतदाता का स्वयं के विरुद्ध संवैधानिक आत्मघात..
▪️संविधान की सारी शक्तियाँ हमारे वोट से ही निर्धारित की जाती हैं। यह वाक्य प्रत्येक सवर्ण नागरिक के कर्णकुहरों में गूँजता है, किन्तु हृदय को विदीर्ण करता है। हम, सवर्ण जाति के मतदाता, अपने वोट की पावन शक्ति से राजा चुनते हैं। हम उसे सिंहासन पर आसीन करते हैं, उसे असीम शक्ति प्रदान करते हैं, उसे भारत का स्वामी मानते हैं। और फिर वही राजा, हमारे ही वोट से प्राप्त शक्ति का दुरुपयोग करके, हमारे स्वर्णिम युग का सर्वनाश आरंभ कर देता है। वह स्वयं को न केवल भारत का, अपितु सम्पूर्ण पृथ्वी का अधिपति समझने लगता है।
▪️यह कैसा लोकतंत्र है, जिसमें सवर्ण का वोट ही सवर्ण के विरुद्ध नियमावली का अस्त्र बन जाता है? हम वोट देते हैं, और उसके बदले में हमें संवैधानिक रूप से प्रताड़ित करने वाले कानून थोप दिए जाते हैं। एक-एक कर, सारे संवैधानिक प्रावधान हमारे गले पर फंदा बन जाते हैं। एससी-एसटी अधिनियम हो या कोई अन्य आरक्षण योजना, वे सब सवर्ण के लिए विष-बाण सिद्ध होते हैं। हमें कहा जाता है—“तुम सवर्ण हो, तुम्हें तो सब कुछ प्राप्त है, अब पीछे हटो।” और हम पीछे हटते जाते हैं, किन्तु हमारी पीठ पर चोटें बढ़ती जाती हैं।
▪️शिक्षा के क्षेत्र में यह अन्याय चरम पर पहुँच चुका है। विश्वविद्यालय हो अथवा विद्यालय का परिसर—जहाँ युवा मन ज्ञान की ज्योति प्राप्त करने आते हैं, वहाँ उन्हें पहले छात्र नहीं रहने दिया जाता। उन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभाजित कर दिया जाता है: एसटी, एससी, ओबीसी और सामान्य। एक ही परिसर में समान शिक्षा का वादा करते हुए भी, समानता का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति का संवैधानिक मौलिक अधिकार होने के बावजूद, इस देश में “समानता” शब्द का अर्थ ही विकृत हो चुका है। अब “समानता” केवल एक शब्दावली बनकर रह गई है, जिसकी परिभाषा समय-समय पर राजनीतिक आवश्यकतानुसार बदलती रहती है।
▪️प्रवेश, छात्रवृत्ति, फीस में छूट, कट-ऑफ अंक—सब कुछ इन श्रेणियों के आधार पर निर्धारित हो जाता है। सामान्य श्रेणी का छात्र, जो अक्सर संवैधानिक रूप से सबसे अधिक करदाता परिवार से आता है, उसे पूर्ण फीस चुकानी पड़ती है, जबकि अन्य श्रेणियों को रियायतें मिलती हैं। हमारी संतान मेडिकल महाविद्यालय में प्रवेश चाहती है, तो उसकी सीटें पहले ही आरक्षित हो चुकी होती हैं। इंजीनियरिंग अथवा अन्य उच्च शिक्षा में भी उसे दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है, दोगुनी फीस चुकानी पड़ती है, किन्तु फिर भी अंतिम पंक्ति में स्थान मिलता है। कोई रियायत नहीं, कोई छूट नहीं। पूरी फीस!
▪️परन्तु अब तो स्थिति हास्यास्पद स्तर पर पहुँच चुकी है। सरकार ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि शून्य अंक वाले को स्थान मिले, -40 अंक वाले को भी आरक्षित जगह सुरक्षित हो। विशेषकर NEET-PG जैसी परीक्षाओं में, आरक्षित श्रेणियों के लिए क्वालीफाइंग परसेंटाइल को शून्य या उससे नीचे कर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप नकारात्मक अंक वाले अभ्यर्थी भी एमडी, एमएस जैसी उच्च विशेषज्ञता वाली सीटें प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे प्रावधान देखकर हँसी आती है, किन्तु यह हँसी व्यथित हृदय की है—व्यंग्यपूर्ण, पीड़ादायक।
▪️परिसर में छात्र केवल छात्र नहीं रहते—वे पहले अपनी जाति-आधारित श्रेणी बन जाते हैं। दोस्ती, सहपाठिता, प्रतियोगिता—सब कुछ उस श्रेणी की छाया में आ जाता है। एक ओर जहाँ पिछड़े वर्गों के उत्थान की आवश्यकता निर्विवाद है, वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग के युवाओं को लगता है कि उनकी मेहनत, योग्यता और सपनों को श्रेणी के आधार पर दंडित किया जा रहा है। समान शिक्षा का परिसर अब श्रेणीबद्ध शिक्षा का मैदान बन चुका है, जहाँ “समानता” शब्द केवल संविधान की किताबों में सुरक्षित है, वास्तविकता में उसका अर्थ “विशेषाधिकार” और “आरक्षण” से प्रतिस्थापित हो गया है।
▪️यह कैसा न्याय है, जिसमें न्याय के नाम पर अन्याय का राज चलता है? और सबसे विस्मयजनक बात—ये सब हमारे ही वोट से चुने गए प्रतिनिधियों के कारनामे हैं। विरोध भी नहीं करते ये लोग, बल्कि सहमति देते हैं, मौन स्वीकृति प्रदान करते हैं। जनता त्रस्त है, नेता मस्त हैं। सवर्ण मतदाता आज भी वही पुरानी भूल दोहराता है। वह उसी को वोट देता है, जिसने उसके स्वर्णिम युग का विनाश कर दिया है। और फिर विलाप करता है—क्यों मेरी पुत्री को शिक्षा का अधिकार नहीं? क्यों मेरे पुत्र को रोजगार का अधिकार नहीं? क्यों मैं, जो संविधान की रक्षा में सबसे अधिक योगदान देता हूँ, उसी संविधान द्वारा कुचला जा रहा हूँ?
▪️हे सवर्ण बंधुओं! हे युवा पीढ़ी! अब जागने का समय आ गया है। अपना वोट अब अपनी रक्षा के लिए दो। अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए दो। क्योंकि वही नेता, जिसे तुमने अपने वोट से शक्ति दी, अब तुम्हें ही चुन-चुनकर मार रहा है। और यह मार संवैधानिक है, कानूनी है तथा सबसे भयानक—तुम्हारे अपने वोट से ही जायज ठहराई जा रही है।
▪️संविधान की सारी शक्तियाँ हमारे वोट से ही निर्धारित की जाती हैं। अतः अब वोट को जागरूक बनाओ, अन्यथा यह वोट ही तुम्हारा सर्वनाश बन जाएगा। शिक्षा के परिसर में सच्ची समानता की माँग करो, जहाँ प्रत्येक छात्र केवल छात्र हो, न कि कोई श्रेणी। क्योंकि जब तक परिसर में छात्र को छात्र नहीं रहने दिया जाएगा, तब तक भारत का भविष्य भी श्रेणियों में बँटा रहेगा।
✍️“मेरी कलम से – ब्रजेश कुमार त्रिवेदी”