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राजा दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी के मानस पुत्र (मन से उत्पन्न पुत्र) हैं और प्रजापतियों (सृष्टि के रचयिताओं) में प्रमुख

राजा दक्ष प्रजापति हिंदू कथाओं में ब्रह्मा जी के मानस पुत्र (मन से उत्पन्न पुत्र) हैं और प्रजापतियों (सृष्टि के रचयिताओं) में प्रमुख माने जाते हैं। वे सृष्टि की वृद्धि और प्रजा विस्तार के लिए जाने जाते हैं। दक्ष प्रजापति की पत्नी प्रसूति (या अस्कनी/वीरणी के रूप में भी वर्णित) से कई पुत्रियाँ हुईं, जिनमें सबसे छोटी सती थीं। सती शिव भगवान की परम भक्त थीं और उन्होंने शिव से विवाह करने का दृढ़ संकल्प किया। दक्ष प्रजापति शिव को उनकी वेशभूषा, साधना शैली और “औघड़” रूप के कारण पसंद नहीं करते थे। फिर भी, सती के हठ और ब्रह्मा जी के कहने पर विवाह हो गया।दक्ष प्रजापति को अपनी शक्ति, पद और यज्ञीय अधिकार का बहुत अभिमान था। एक बार उन्होंने एक भव्य यज्ञ (दक्ष प्रजापति यज्ञ) का आयोजन किया, जिसमें सभी देवताओं, ऋषियों और प्रजापतियों को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव और पुत्री सती को नहीं बुलाया। यह शिव का घोर अपमान था।सती को जब यज्ञ की बात पता चली, तो वे पिता से पूछने और शिव का सम्मान दिलवाने के लिए बिना बुलाए यज्ञ स्थल पर पहुँच गईं। दक्ष प्रजापति ने वहाँ भी शिव का तीखा अपमान किया और उन्हें “भूत-प्रेतों का स्वामी, कपाली, अघोरी” आदि कहकर अपमानित किया। सती यह सहन न कर सकीं। उन्होंने अपने पिता और शिव के अपमान से दुखी होकर यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया। यह सुनकर भगवान शिव क्रोध से भर गए। उन्होंने अपनी जटाओं से वीरभद्र और भद्रकाली को प्रकट किया। वीरभद्र ने यज्ञ स्थल को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया, कई देवताओं को दंडित किया और दक्ष प्रजापति का सिर काट दिया। बाद में, जब शिव का क्रोध शांत हुआ और सती की मृत्यु का शोक हुआ, तो उन्होंने दक्ष प्रजापति को पुनः जीवनदान दिया। दक्ष प्रजापति का कटा सिर यज्ञ की आग में चला गया था, इसलिए शिव ने उसकी जगह बकरे (या मेष) का सिर लगा दिया। दक्ष प्रजापति तब शिव की शरण में आए और उनका अभिमान चूर-चूर हो गया।यह कथा अहंकार के विनाश और भक्ति की महत्ता सिखाती है। दक्ष प्रजापति का अभिमान सृष्टिकर्ता होने के बावजूद उन्हें अंधा बना देता है, जबकि सती की निस्वार्थ भक्ति शिव के साथ उनके अटूट संबंध को दर्शाती है। बाद में सती पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेकर शिव से विवाह करती हैं। यह घटना शिव पुराण, भागवत पुराण, स्कंद पुराण आदि में विस्तार से वर्णित है। कुछ पुराणों में दक्ष प्रजापति के दो जन्मों का भी उल्लेख है।

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