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*नागरिक परिक्रमा* *(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां)* *1. केरल में संतुलन खोते राहुल गांधी*

*प्रकाशनार्थ*

*नागरिक परिक्रमा*
*(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां)*

*1. केरल में संतुलन खोते राहुल गांधी*

माकपा और कांग्रेस दोनों इंडिया ब्लॉक की पार्टियां हैं, लेकिन केरल में सत्ता के लिए टक्कर भी इन्हीं दोनों के बीच है। केरल का इतिहास रहा है : एक बार माकपा और अगली बार कांग्रेस। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में माकपा ने इस मिथक को तोड़ दिया। केरल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि कोई पार्टी पुनः लगातार चुनकर सत्ता में पहुंची हो और यह इतिहास माकपा ने बनाया है। इस बार होने जा रहे विधानसभा चुनाव में माकपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की लड़ाई लड़ रही है, तो कांग्रेस पिछले दस साल के सूखे को खत्म करना चाहती है। कांग्रेस को यह लग रहा है कि यदि इस बार भी वह सत्ता से दूर रही और माकपा तीसरी बार विजयी हो गई, तो बंगाल का इतिहास न बन जाएं, जहां माकपा ने लगातार 35 सालों तक शासन किया था।

इसलिए चुनावी लड़ाई काफी तल्ख है। लेकिन फिर भी यदि कांग्रेस पूरे देश में भाजपा के विकल्प के रूप में उभरना चाहती है, तो यह तल्खी इतनी नहीं होनी चाहिए कि इंडिया ब्लॉक को ही कमजोर कर दे। आखिर, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते इंडिया ब्लॉक को मजबूत करने और उसे स्थायित्व देने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी कांग्रेस पर ही आती है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि अपनी इस जिम्मेदारी के प्रति कांग्रेस सचेत है।

केरल के अंदर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की माकपा के प्रति तल्खी समझ में आती है, लेकिन प्रतिपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान यह बताते है कि इतिहास से वे कुछ भी सीखने के लिए तैयार नहीं हैं। हाल ही में कांग्रेस के इन दोनों सर्वोच्च नेताओं ने बयान दिया है कि ईडी और अन्य केंद्रीय एजेंसियों को केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को गिरफ्तार करना चाहिए। ऐसे बचकाने भरे बयान की उम्मीद किसी को नहीं थी, क्योंकि केरल के मुख्यमंत्री की ईमानदारी और माकपा की धर्मनिरपेक्ष साख पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता। यह विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने के लिए सस्ती बयानबाजी और झूठी अफवाहें फैलाने से ज्यादा और कुछ नहीं है। लेकिन ऐसी बयानबाजी से कांग्रेस को कम और उस भाजपा को ही ज्यादा फायदा होगा, जो केरल विधानसभा में इक्का-दुक्का सीटों के साथ प्रवेश करने की कई सालों से कोशिश कर रही है।

सभी जानते है कि माकपा ने विपक्षी नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का लगातार विरोध किया है। पिछले एक दशक से ज्यादा के मोदी राज में इन संस्थाओं की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को खत्म कर दिया गया है और आज इन केंद्रीय एजेंसियों को राजनैतिक हथियार बनाकर भाजपा अपना जनाधार बढ़ा रही है। इसका शिकार स्वयं कांग्रेस भी हुई है, जिसकी राज्य सरकारों की प्रतिष्ठा को इन एजेंसियों की छद्म कार्यवाहियों के जरिए धूमिल किया गया और चुनावों में उसे शिकस्त दी गई है।

कांग्रेस नेताओं को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर क्यों, एक के बाद एक, अनेक राज्यों में, उनके नेताओं ने पार्टी छोड़ दी और वे भाजपा में शामिल हो गए। यह एक जगजाहिर तथ्य है कि असम के वर्तमान भाजपाई मुख्यमंत्री हिमंता सरमा पिछली कांग्रेस सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले हुए थे। त्रिपुरा में, वाम मोर्चा को हराने के लिए 2018 में पूरा कांग्रेस नेतृत्व भाजपा में विलीन हो गया था। आज केंद्र सरकार के कई मंत्री और भाजपा से जुड़े संसद सदस्य कल तक कांग्रेस के प्रमुख नेता थे। छत्तीसगढ़ में उनके पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अपने कार्यकाल के दौरान भाजपा से मिलीभगत किसी से छुपी हुई नहीं थी और ऐसा कहा जाता है कि वे संघ गिरोह के सरदार मोहन भागवत के दरबार में मत्था भी टेक चुके हैं। अपने राजनैतिक पुनर्वास की खोज में लगे, यही के एक दूसरे कांग्रेसी आदिवासी नेता अरविंद नेताम की भी मोहन भागवत से मुलाकात के बाद कायापलट हो चुकी है। हकीकत यह है कि भाजपा के लिए आज कांग्रेस एक 'फीडर संगठन' (भर्ती का ज़रिया) बन गई है।

यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि वर्तमान माकपा नीत वामपंथी सरकार के दस वर्षों के दौरान, केरल में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ है, जबकि कांग्रेस सरकार का कार्यकाल दंगा मुक्त नहीं था और राज्य में सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगा माराड में हुआ था। इस दंगे पर रोक लगाई जा सकती थी, यदि कांग्रेस संघी गिरोह की सांप्रदायिक हरकतों के प्रति सख्त होती। इन चुनावों में भी, कांग्रेस अल्पसंख्यक कट्टरपंथी ताकतों के साथ गठबंधन कर रही है। केरल के हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भी माकपा और वामपंथ को हराने के लिए कांग्रेस-मुस्लिम लीग-भाजपा के गठजोड़ का नजारा केरल की जनता ने देखा है। मट्टाथुर ग्राम पंचायत में तो एलडीएफ को सत्ता से दूर रखने के लिए सभी निर्वाचित कांग्रेसी वार्ड पार्षदों ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होना पसंद किया है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम में तो भाजपा के उभार के पीछे साफ-साफ शशि थरूर जैसे कांग्रेसी नेताओं का ही हाथ है। कांग्रेस के इस रिकॉर्ड से सांप्रदायिक-तानाशाही ताकतों के खिलाफ लड़ने का कांग्रेस का दावा ही कमजोर होता है।

यह नहीं भूला जाना चाहिए कि कांग्रेस ने इसी तरह दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी की भी मांग की थी, जबकि आम आदमी पार्टी (आप) इंडिया ब्लॉक का हिस्सा थी। कांग्रेस के इस रुख के बाद केजरीवाल इंडिया ब्लॉक से अलग हो गए। इससे इंडिया ब्लॉक कमजोर हुआ और भाजपा को मजबूत होने का मौका मिला। मुख्यमंत्री रहते केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया, यह अलग बात है कि कोर्ट से वे बरी हो गए। लेकिन आप और केजरीवाल के खिलाफ जो दुष्प्रचार अभियान कांग्रेस और भाजपा ने चलाया, उसका कोई फायदा कांग्रेस को तो नहीं मिला, लेकिन भाजपा ने जरूर सत्ता हासिल कर ली। यह कांग्रेस के अवसरवादी चरित्र को बेनकाब करता है। दिल्ली में भाजपा की जीत का बड़ा श्रेय कांग्रेस को ही जाता है।

लेकिन केरल दिल्ली नहीं है, क्योंकि केरल की आम जनता राजनैतिक रूप से काफी जागरूक है। केरल की जनता ने पिछले दस वर्षों के वामपंथी शासन के तहत अभूतपूर्व विकास और सांप्रदायिक सद्भाव को देखा है। वह भाजपा के चरित्र को भी समझती है और राहुल गांधी के बयानबाजी की गहराई को भी। केरल चुनाव के नतीजों में आम जनता की राजनैतिक जागरूकता की झलक साफ-साफ दिखाई देगी।
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*2. एक रूपये प्रति लीटर में दूध!*

है न चौंकाने वाली बात! लेकिन है सही। जी हां, कर्नाटक में फ्लिपकार्ट अपने प्रचारात्मक बिक्री अभियान के तहत एक रूपये प्रति लीटर की दर पर दूध बेच रहा है। इस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का स्वामित्व अमेरिकी खुदरा दिग्गज वॉलमार्ट के पास है। प्रचार अवधि के दौरान लाखों लीटर दूध मिट्टी के भाव में फ्लिपकार्ट ने बेचा है, जिससे बेंगलुरु मिल्क यूनियन लिमिटेड जैसे सहकारी संघों की बिक्री में लगभग 50,000 लीटर प्रतिदिन की कमी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर पशुपालक और दूध उत्पादक किसानों की आजीविका पर पड़ा है। ऐसा ही चलता रहा, तो कुछ दिनों में ही कर्नाटक की सहकारी समितियों के ठप्प होने का खतरा पैदा हो गया है।

यह तो केवल झांकी है। जब अमेरिका और विभिन्न विकसित देशों के साथ केंद्र की भाजपा सरकार ने जो मुक्त व्यापार समझौते किए हैं, उन पर अमल के कृषि क्षेत्र में जो परिणाम सामने आएंगे, वे हमारे किसानों और खेती-किसानी के लिए कितने विनाशकारी होंगे, कर्नाटक के दूध बाजार पर कब्जे के लिए वॉलमार्ट द्वारा की जा रही इस आक्रामक नीति से समझा जा सकता है। फ्लिपकार्ट द्वारा एक रूपये की कीमत पर दूध की बिक्री कोई साधारण मार्केटिंग अभ्यास नहीं है, बल्कि वैश्विक पूंजी से समर्थित बड़ी प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली शिकारी मूल्य निर्धारण की एक क्लासिक मिसाल है, जिसका शिकार भारत और तीसरी दुनिया के गरीब देशों को बनाया जा रहा है। ऐसी रणनीतियाँ बाजार पर कब्ज़ा करने, मौजूदा सहकारी संस्थाओं को कमजोर करने और घरेलू उत्पादन प्रणाली को नष्ट करने और अंततः खरीद व वितरण पर कॉरपोरेट नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से अपनाई जाती हैं। तीसरी दुनिया का शोषण करने की यह साम्राज्यवादी रणनीति है।

वालमार्ट-फ्लिपकार्ट की इस शिकारी रणनीति से पूरे कर्नाटक डेयरी किसानों में गुस्सा पैदा हुआ है, लेकिन अमित शाह के नेतृत्व वाला सहकारिता मंत्रालय अभी तक सोया हुआ है। उसने कर्नाटक के किसानों को बचाने के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है और ऐसा लगता है कि उसने विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों और बाजार के दबाव के आगे समर्पण कर दिया है।

दूध बाजार पर यह आक्रमण ऐसे समय में और भी चिंताजनक है, जब डेयरी किसान पहले से ही बढ़ती लागत, भुगतान में देरी और दूध उत्पादन के लिए उचित लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। कर्नाटक के दूध बाजार पर कब्जे के लिए फ्लिपकार्ट के इस शिकारी अभियान के बाद किसानों के दूध के औसत विक्रय मूल्य में भारी गिरावट तो आई ही है, दूध बिक्री में गिरावट के मद्देनजर सोसायटियों ने किसानों का दूध खरीदना भी कम कर दिया है। इस प्रकार, किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। दूध बाजार पर कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा आक्रमण की यह रणनीति भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा निर्धारित मानदंडों का भी उल्लंघन करती है और इसकी जांच की जानी चाहिए।

यह तो साफ है कि भविष्य में सहकारी संस्थाओं पर और ज्यादा हमले होंगे। उतना ही यह भी साफ है कि न तो अमित शाह के हाथ में देश का सहकारिता क्षेत्र सुरक्षित है और न ही संघी गिरोह के हाथ में देश का भविष्य सुरक्षित है।

*(टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
*Indian Council of press,Nagpur*
Journalist Cell
*All India Media Association
Nagpur*
*District President*
*Delhi Crime Press*
RNI NO : DELHIN/2005/15378
AD.Associate /Reporter
*INDIAN PRESS UNION*
District Reporter
Contact no.
9422428110/9146095536
Head office:- plot no 18/19, flat no. 201,Harmony emporise, Payal -pallavi society new Manish Nagar somalwada nagpur - 440015

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