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निरंकुश होता चौथा स्तंभ “जब समाचार सत्य से अधिक ‘ट्रेंड’ बनने लगे, तब समझ लीजिए—लोकतंत्र का चौथा स्तंभ धीरे-धीरे निरंकुश हो रहा है।”

✒️ हरिदयाल तिवारी
लोकतंत्र में पत्रकारिता को “चौथा स्तंभ” कहा गया है—एक ऐसा स्तंभ जो सत्ता को संतुलित करता है, समाज को जागरूक बनाता है और सत्य को सामने लाने का कार्य करता है। परंतु आज यही स्तंभ धीरे-धीरे अपनी मूल आत्मा से दूर होता दिखाई दे रहा है।
पत्रकारिता की पहली शर्त होती है—समाचार में शुद्धता हो, तथ्य हों, निष्पक्षता हो; व्यक्तिगत विचारों का हस्तक्षेप न्यूनतम हो। किंतु वर्तमान समय में यह सीमा धुंधली पड़ गई है। “एडिट” की परंपरा, जो कभी पत्रकारिता की आत्मा मानी जाती थी, अब लगभग समाप्तप्राय है। सत्यापन और संतुलन के स्थान पर त्वरित प्रसारण और आकर्षण ने जगह ले ली है।
डिजिटल युग ने हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच दिया है। यह एक सकारात्मक परिवर्तन भी है, परंतु इसके साथ जिम्मेदारी का अभाव एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। अब हर व्यक्ति स्वयं को पत्रकार मानकर सूचना प्रसारित कर रहा है—बिना किसी तथ्य-जांच, बिना किसी नैतिक दायित्व के। परिणामस्वरूप समाचार कम, और मत-प्रदर्शन अधिक दिखाई देता है।
यह स्थिति धीरे-धीरे अराजकता की ओर संकेत करती है। जब सूचना का स्रोत अस्पष्ट हो, जब सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाए, तब समाज भ्रमित होता है। लोकतंत्र की मजबूती सूचना की शुद्धता पर निर्भर करती है, और जब वही संदिग्ध हो जाए, तो पूरा तंत्र प्रभावित होता है।
फिर भी, यह पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। यह एक संक्रमण का दौर है, जिसमें सुधार की संभावनाएँ भी निहित हैं। आवश्यक है कि मीडिया पुनः अपने मूल मूल्यों—सत्य, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व—की ओर लौटे। साथ ही, समाज को भी जागरूक उपभोक्ता बनना होगा, जो हर सूचना को विवेक और समझ के साथ ग्रहण करे।
अंततः, चौथा स्तंभ तभी सशक्त रह सकता है जब वह निरंकुश नहीं, बल्कि उत्तरदायी हो—सत्य के प्रति, समाज के प्रति और लोकतंत्र के प्रति।

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