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*इज़रायली जेलों में फ़िलिस्तीनी अस्मिता का क़त्ल* *(आलेख : मज़्कूर आलम, साभार : नया पथ)*

*प्रकाशनार्थ*

*इज़रायली जेलों में फ़िलिस्तीनी अस्मिता का क़त्ल*
*(आलेख : मज़्कूर आलम, साभार : नया पथ)*

*(1967 से इज़रायल के क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी हिस्सों में मानवाधिकारों की स्थिति की जो तस्वीर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक फ़्रांसेस्का अलबानीज़ ने खींची है, उसके बारे में बता रहे हैं मज़्कूर आलम।)*

दुनिया के सियासी मंच पर जिस अमेरिका-इज़रायल ने वर्षों तक ईरान को ‘दुनिया के अमन के लिए ख़तरा’ और वहाँ की हुकूमत को ‘दुनिया का सबसे जालिम निज़ाम’ करार देकर अलग-थलग करने की कोशिश की, आज वही इज़रायल ‘क्रूरता की खौफ़नाक प्रयोगशाला’ चलाने के लिए कटघरे में खड़ा है। वह भी इतना भयावह, जो अकल्पनीय है।

कमाल तो यह है कि ईरान में मानवाधिकारों की दुहाई देने वाली पश्चिमी ताक़तें इज़रायली जेलों से आती फ़िलिस्तीनी कैदियों की सिसकियों पर ख़ामोश हैं।

संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट ने इस दोहरेपन को बेनकाब कर दिया है, जहाँ एक तरफ ईरान के ख़िलाफ़ ‘नैतिकता का परचम’ बुलंद किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ इज़रायली हिरासत केंद्रों में फ़िलिस्तीनी अस्मिता का कत्ल ‘राजकीय सिद्धांत’ बन चुका है। जो इल्ज़ाम कल तक तेहरान पर लगाये जाते थे, आज वही बर्बरियत —हड्डियां तोड़ना, यौन शोषण और अमानवीय प्रताड़ना —तेल अवीव की जेलों में सरकारी सरपरस्ती में अंजाम दी जा रही है। यह महज कैद नहीं, बल्कि एक पूरी कौम को मानसिक और रूहानी तौर पर फ़ना करने की संगठित साज़िश का हिस्सा है।

संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट बताती हैं कि इज़रायल में बेइंतहा जुल्मो-सितम ‘राजकीय सिद्धांत’ बन गया है और उसे सियासी सहमति हासिल है। अक्टूबर 2023 से अब तक ज़ुल्म की यह शृंखला 18,500 से अधिक फ़िलिस्तीनियों को अपनी ज़द में ले चुकी है, जिनमें 1,500 से ज़्यादा मासूम बच्चे शामिल हैं। ये महज़ आंकड़े नहीं, बल्कि उन हज़ारों ज़िन्दगियों की दास्तान हैं, जिन्हें बिना किसी इल्ज़ाम या मुक़दमे के सलाखों के पीछे धकेल दिया गया है। तक़रीबन 100 क़ैदियों की हिरासत में हुई मौतें इस निज़ाम की बर्बरियत की गवाही देती हैं।

इज़रायली जेलें अब महज़ क़ैदखाने नहीं, बल्कि ‘सोची-समझी क्रूरता की प्रयोगशाला’ बन चुकी हैं, जहाँ क़ैदियों के साथ ऐसी अमानवीय और घिनौनी हरकतें की जा रही हैं, जो इंसानियत को शर्मसार कर दें। लोहे की छड़ों और चाकुओं से जिस्मानी यौन शोषण, हड्डियों और दांतों को बेरहमी से तोड़ना, फाक़ाकशी और क़ैदियों पर शिकारी कुत्तों को छोड़ना — ये वे अकल्पनीय जुल्म हैं, जिनका मक़सद फ़िलिस्तीनियों को केवल जिस्मानी तौर पर ही नहीं, बल्कि ज़हनी और रूहानी तौर पर भी पूरी तरह शिकस्त देना है। यह संगठित दरिंदगी अब अंधेरे में नहीं, बल्कि हुकूमत के ऊंचे गलियारों की शह पर खुलेआम अंजाम दी जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषज्ञ ने आगाह किया है कि दशकों से मिल रही छूट और सियासी सरपरस्ती के सबब, फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ इज़रायल की यह लगातार प्रताड़ना अब कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में जारी ‘नस्लकुशी’ का हथि‍यार बन गयी है।

*‘जुल्म की लैब’ बनती जेलें*

1967 से कब्जे वाले फिलिस्तीनी इलाक़ों में मानवाधिकारों की सूरतेहाल पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत फ्रांसेस्का अल्बानीज़ ने मानवाधिकार परिषद को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है, “नस्लकुशी के आगाज़ के बाद से इज़रायली जेल निज़ाम ‘सोची-समझी क्रूरता की प्रयोगशाला’ में तब्दील हो गया है।”

*रुस्वाई और तौहीन का दौर*

अल्बानीज़ के मुताबिक, “जो काम कभी साये और अंधेरे में किया जाता था, वह अब खुलेआम हो रहा है। संगठित अपमान, पीड़ा और ज़िल्लत का यह शासन अब उच्चतम सियासी स्तरों से मंजूर-शुदा है।” यानी जो दर्द पहले छिपाया जाता था, अब उसे हुकूमत की सरपरस्ती में सरेआम अंजाम दिया जा रहा है।

*संस्थानिक प्रताड़ना*

रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर समेत आला अधिकारियों द्वारा लागू की गई पॉलिसियों ने टॉर्चर, सामूहिक सज़ा और हिरासत की अमानवीय हालात को ‘संस्थागत शक्ल’ दे दी है। यह फ़िलिस्तीनियों को इंसान न समझने की सोची-समझी साज़िश है।

*इंसाफ की पुकार*

विशेष दूत ने साफ़ तौर पर कहा कि मानवाधिकारों के इन संगीन उल्लंघनों के ज़िम्मेदार लोगों को जांच और इंसाफ का सामना करना होगा। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जंग के दौर में भी इन बुनियादी हक़ूक़ से महरूम नहीं किया जा सकता और मुजरिमों को ‘अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय’ (आईसीसी) के कटघरे में खड़ा होना ही पड़ेगा।

*आंकड़ों में छिपी सिसकियां*

अल्बानीज़ की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अक्टूबर 2023 से अब तक कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी इलाके में 18,500 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है। हज़ारों लोग बिना किसी जुर्म के क़ैद हैं, कई ‘जबरन गायब’ कर दिये गये हैं और लगभग 100 क़ैदी हिरासत में दम तोड़ चुके हैं।

*अकल्पनीय दरिंदगी*

क़ैदियों के साथ ऐसी हैवानियत की गयी है, जो कल्पनाओं से भी परे है। रिपोर्ट में बोतलों, लोहे की सलाखों और चाकुओं से बलात्कार, भुखमरी, जिस्म को जलाना और कुत्तों से हमला करवाने जैसी हौलनाक प्रताड़नाओं का ज़िक्र है। साल 2025 में प्रताड़ना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र समिति ने भी इसे एक मुकम्मल ‘राजकीय नीति’ करार देते हुए इसकी निंदा की थी।

*दुनिया की ख़ामोशी पर सुलगते सवाल*

इस बर्बरियत को दुनिया के रहनुमाओं द्वारा बचाव मिल रहा है, क़ानूनी संस्थाएं इसे जायज़ ठहरा रही हैं और मीडिया इसे साफ-सुथरा बनाकर पेश कर रहा है। वे हुकूमतें भी खामोश तमाशाई बनी हुई हैं, जो इज़रायल को हथियार और ताक़त मुहैय्या करा रही हैं।

*जेल की दीवारों के पार भी कयामत*

रिपोर्ट के मुताबिक, टॉर्चर सिर्फ जेल की चहारदीवारी तक महदूद नहीं है। मुसलसल बमबारी, बेदखली, फाकाकशी और दहशतगर्द समूहों के खौफ़ ने पूरे फ़िलिस्तीनी इलाके को एक ‘दोज़ख’ में बदल दिया है। अल्बानीज़ ने जज़्बाती अंदाज़ में कहा, “गाज़ा, वेस्ट बैंक और कब्जे वाले यरूशलेम में फ़िलिस्तीनी दुखों की अटूट शृंखला से गुज़र रहे हैं। वहां कोई पनाहगाह नहीं है, कोई सुरक्षित कोना नहीं है।”

*गरिमा का विनाश*

विशेषज्ञ ने बेहद मार्मिक होकर कहा, “प्रताड़ना एक शख़्स के साथ वही करती है, जो नस्लकुशी एक कौम के साथ करती है। यह इंसान की गरिमा और अस्मिता को ज़मींदोज़ कर देती है और उसे महज़ इस्तेमाल की चीज़ बनाकर छोड़ देती है।”

अल्बानीज़ ने इज़रायल से इन तमाम कार्यों को फ़ौरन रोकने और दोषियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। उन्होंने दुनिया से अपील की है कि इतामार बेन-ग्वीर और बेज़ालेल स्मोट्रिच जैसे ज़िम्मेदार अफ़सरों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किये जायें, वरना अंतर्राष्ट्रीय क़ानून महज़ बेमानी काग़ज़ का टुकड़ा बनकर रह जायेगा।

*(लेखक पत्रकार हैं। संपर्क : 97178-61898, ई-मेल : mazkooralam@gmail.com)*

*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
*Indian Council of press,Nagpur*
Journalist Cell
*All India Media Association
Nagpur*
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