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UPSRTC लखनऊ में मृतक आश्रित भर्ती पर बड़ा खेल ? हैदरगढ़ डिपो की कार्यशैली पर गंभीर सवाल 🚍💯✅

हैदरगढ़ डिपो में तैनाती पर उठे गंभीर सवाल 🚍👇👇👇

लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के लखनऊ क्षेत्र में मृतक आश्रित कोटे से हुई परिचालक भर्ती को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि जिन परिचालकों की परिवीक्षा अवधि (प्रोबेशन) अभी पूरी भी नहीं हुई है, उन्हें नियमों के विपरीत कार्यालयों में तैनात किया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, हैदरगढ़ डिपो इस मामले में सबसे आगे बताया जा रहा है। यहां मृतक आश्रित कोटे से नियुक्त 11 नियमित परिचालकों में से 6 को कार्यालय कार्य में लगा दिया गया है। आरोप है कि यह सब कुछ सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक और एक कथित बाबू के संरक्षण में किया जा रहा है। इसको लेकर विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर, ऐसे कई नियमित पुरुष एवं महिला परिचालक हैं जो करीब 10 वर्षों से फील्ड में सेवा दे रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक न तो पदोन्नति मिली और न ही कार्यालय में तैनाती का अवसर दिया गया। इससे वरिष्ठता और पारदर्शिता दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मामले को और गंभीर बनाते हुए यह भी सामने आया है कि हैदरगढ़ डिपो के सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक को क्षेत्रीय प्रबंधक द्वारा कई बार कार्यशैली में सुधार लाने के सख्त निर्देश दिए जा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं दिखा। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर उच्च अधिकारियों के निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा।

यदि उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की सेवा नियमावली पर नजर डालें तो परिवीक्षा अवधि आमतौर पर 1 से 2 वर्ष की होती है, जिसमें नव नियुक्त परिचालकों को फील्ड ड्यूटी के माध्यम से प्रशिक्षण और मूल्यांकन से गुजरना होता है। इस दौरान उनके कार्य, व्यवहार, अनुशासन और राजस्व प्रबंधन की समीक्षा की जाती है। संतोषजनक प्रदर्शन के बाद ही उन्हें स्थायी किया जाता है। नियमों के मुताबिक, कार्यालय तैनाती आमतौर पर अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर दी जाती है, न कि परिवीक्षा अवधि में ही विशेष सुविधा के रूप में।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुख्यालय स्तर से ऐसा कोई आदेश जारी किया गया है, जिसके तहत प्रोबेशन में ही परिचालकों को कार्यालय में तैनात किया जा सकता है? यदि ऐसा कोई आदेश है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा।

अब देखना होगा कि लखनऊ क्षेत्रीय प्रबंधन इस पूरे मामले पर कब संज्ञान लेता है और क्या निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाती है, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा !

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