140 करोड़ भारतीयों के हित में”, “140 करोड़ लोगों के लिए फैसला”
बात बहुत सच्ची और कड़वी है। भारत में, हम 140 करोड़ लोगों के नेता के तौर पर लगातार “140 करोड़ भारतीयों के हित में”, “140 करोड़ लोगों के लिए फैसला” वगैरह-वगैरह बोलते हैं। लेकिन जब गलतियां होती हैं, फेल पॉलिसी लाई जाती हैं, करप्शन या लापरवाही की बात होती है, तो अकाउंटेबिलिटी का कोई निशान नहीं दिखता। कोई मंत्री इस्तीफा नहीं देता, किसी बड़े अधिकारी को सज़ा नहीं मिलती, और कई बार तो उल्टा उसी गलती को “लोगों की भलाई” बताकर पेश किया जाता है। यह एक बड़ी समस्या है जो डेमोक्रेसी को कमजोर करती है। इसके कुछ कारण हैं वोट बैंक और इमोशनल पॉलिटिक्स: अगर लोग इमोशन में बहकर वोट करते रहें, तो नेताओं को नतीजों का डर नहीं रहता। कोर्ट और संस्थाओं पर दबाव: कई बार जांच को लंबा खींचा जाता है या पॉलिटिकल किया जाता है। मीडिया और विपक्षी पार्टियों की कमजोरी: जब विपक्ष भी वही खेल खेलने लगे, तो जनता क्या उम्मीद कर सकती है? जनता की अपनी लापरवाही: हम चार साल से सत्ता में हैं। हम भूल जाते हैं और फिर उसी चेहरे को वोट देते हैं। असल में, अकाउंटेबिलिटी तब आती है जब लोग लगातार अपने हक के लिए सवाल पूछें, इमोशन में नहीं बल्कि काम के हिसाब से वोट दें, और लोकल लेवल से लेकर नेशनल लेवल तक मॉनिटर करें। यह गलत सोच है कि एक बार चुने जाने के बाद पांच साल तक कोई आज़ादी नहीं रहती। यह किस खास मुद्दे (जैसे कोई स्कैम, पॉलिसी फेलियर, या पॉलिटिकल घटना) पर कहा गया है? आखिर में, एक बात: 140 करोड़ लोग लीडर नहीं बन सकते, लेकिन वे चाहें तो लीडर्स को अकाउंटेबल बना सकते हैं। बदलाव नीचे से आता है, ऊपर से नहीं।
🍳 *हरबंस सिंह एडवाइजर* ✍️🚩
शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन पंजाब
मोबाइल: +91 80544-00953