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*पश्चिम एशिया पर संसद में मोदी : बोले तो खूब, मगर कहा कुछ नहीं* *(आलेख : बादल सरोज)*

*प्रकाशनार्थ*

*पश्चिम एशिया पर संसद में मोदी : बोले तो खूब, मगर कहा कुछ नहीं*
*(आलेख : बादल सरोज)*

पूरी दुनिया को चितित और स्तब्ध कर देने वाले युद्ध – जिसे युद्ध कहना भी सही नहीं है, जो दुनिया के दो सबसे बनैले भेडियों इजरायल और अमरीका का विश्व शान्ति, सभ्य समाज की अब तक की अवधारणा तथा मनुष्यता को चीन्थने के लिए झपटना है – के चौथे सप्ताह में पहुँच जाने के बाद अंततः भारत के प्रधानमंत्री ने इस मसले पर अपना मौन तोड़ा और 24 मार्च को राज्य सभा में उन्होंने भारत सरकार का रुख रखा। यह पहली बार था, जब संसद या कहीं भी बोलते हुए उन्होंने न हाथ घुमाए, न भंगिमाएं दिखाईं, न ताने तिश्ने मारे, न वक्तृत्व कला दिखाई : आवाज में बिना किसी आरोह-अवरोह के, झुकी-झुकी नजरों से कोई 1889 शब्द के वक्तव्य को वे पढ़ भी गए, सुना भी गए – देश जाम वकफ बैठा ही रहा, वे फैला भी गए, लुढ़का भी गए । अपने भाषणों की दीर्घता के हिसाब से तो कम ही बोले, मगर जितना भी बोले, उसमें कहा कुछ नहीं।

इस भाषण में ‘हमें हर चुनौती के लिए तैयार रहना होगा। सरकार सतर्क है, तत्पर है और पूरी गंभीरता से रणनीति बना रही है, हर निर्णय ले रही है। देश की जनता का हित हमारे लिए सर्वोपरि है।‘, जैसी लफ्फाजियों की भरमार थी। ‘अब तक 3 लाख 75 हज़ार से अधिक भारतीयों के सुरक्षित भारत लौट आने और बीते कुछ दिनों में दुनिया के अनेक देशों से कच्‍चा तेल और एलपीजी से भरे जहाज भारत आने के बावजूद पेट्रोल, डीजल, गैस और फर्टिलाइजर जैसे जरूरी सामान के रूटीन सप्लाई प्रभावित होने, गल्फ देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहने की आदि की सूचनाएं थीं व उनके जीवन और आजीविका की सुरक्षा और होर्मुज स्ट्रेट में फंसे जहाज़ों और उनमें बहुत बड़ी संख्या में भारतीय क्रू मेंबर्स को लेकर चिंतायें थीं। पश्चिम एशिया के ज्यादातर देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ दो राउंड फोन पर बात करने, खाड़ी के सभी देशों सहित ईरान, इजरायल और अमेरिका के साथ संपर्क में होने की जानकारियाँ थीं। डायलॉग और डिप्लोमेसी के माध्‍यम से इस समस्या के समाधान की सदाबहार बातें थीं और युद्ध किसी के भी हित में नहीं है, जैसे जुमले थे। क्रूड ऑयल के पर्याप्त स्टोरेज के और निरंतर सप्लाई की व्यवस्था, मेड इन इंडिया जहाज और अपनी जरूरत के अधिकांश हथियार भारत में ही बनाने, इकोनॉमी के फंडामेंटल्‍स मजबूत होने, पल-पल बदलते हालात पर नजर रखने, शॉर्ट टर्म, मीडियम टर्म और लॉन्ग टर्म ऐसे हर प्रभाव के लिए रणनीति होने तथा बुवाई के सीजन में किसानों को पर्याप्त खाद मुहैया कराने जैसे खुद की पीठ खुद ही थपथपाने की थोथे चने की तरह घणी बजती आत्मप्रवंचनाएं थीं। गैर जिम्मेदारी साक्षात थी : जिसे वे स्वयं अत्यंत गंभीर स्थिति मान रहे थे और जनता पर उसके असर को लेकर खुद को चिंतित बता रहे थे, उनसे निबटने की जिम्मेदारियां प्रदेश सरकारों पर डाल रहे थे। राज्यों से कह रहे थे कि वे पीएम गरीब कल्याण अन्‍न योजना का लाभ समय पर मिलता रहे, यह सुनिश्चित करे। प्रवासी मजदूरों की परेशानियों को दूर करने के लिए प्रोएक्टिव कदम उठाए जाएं। वैश्विक संकट के समाधान का दायित्व निबाहने के लिए राज्य सरकारों का आव्हान कर रहे थे ।

गरज यह कि इतनी देर के बाद दिए गए भाषण में वह सब कुछ था, जिसके न होने से भी काम निकल सकता था और ठीक वही नहीं था, जिसकी इस वक़्त सबसे अधिक आवश्यकता थी। सारे अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व जनमत की भावना के विरुद्ध, भारत के सदियों पुराने परंपरागत मित्र देश ईरान पर बिना किसी वजह के ट्रम्प के अमरीका और नेतन्याहू के इजरायल द्वारा किये गए हमले के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं था। भारत के सर्वकालिक मित्र देश ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई की निर्मम तरीके से की गयी हत्या पर एक शब्द तक नहीं था : उन्हें श्रद्धांजलि तो दूर की बात रही, उनकी मौत तक का उल्लेख नहीं था। हमले की शुरुआत 165 स्कूली बच्चियों के जिस नृशंस नरसंहार से की गयी थी, उस पर दिखावटी टिप्पणी तक नहीं थी।

यह ऐसा प्रवचन था, जिसमें मौजूदा विश्व की सबसे बड़ी पीड़ा गज़ा के नरसंहार, वेनेजुएला के साथ की गयी उद्दंडता, दुनिया को फिर से गुलाम बनाने की सार्वजनिक रूप से की घोषित मंशाओं, देशों की सम्प्रभुताओ को कुचल कर उनके नेताओं की हत्याओं के खुलेआम किये जाने वाले एलानों के बारे में आपति या भर्त्सना तो छोडिये, असहमति और अप्रसन्नता तक नहीं जताई गयी थी। युद्ध के बारे में जो भी ढीला-पोला कहा गया, वह भी या तो ईरान, इजरायल और अमरीका को एक साथ एक ही पलड़े में रखकर कहा गया या फिर इस तरह कहा गया कि ईरान को ही दोषी ठहराया जा सके। इसमें भी सावधानी बरती गयी थी कि कहीं रंगा-बिल्ला नाराज न हो जायें। “कमर्शियल जहाजों पर हमला और होर्मुज स्ट्रेट जैसे अंतर्राष्ट्रीय जल मार्ग में रुकावट अस्वीकार्य है“ की बात तो कही, मगर इसकी जरूरत क्यों आन पड़ी, इस पर कुछ नहीं बोले। यहाँ तक कि भारत के मेहमान बनकर लौट रहे ईरान के तीन जहाज़ों पर भारत की सीमा में ही हमला करने की अमरीका की सरासर भारत का अपमान करने वाली कार्यवाही के बारे में भी कुछ नहीं कहा। उलटे ‘भारत ने नागरिकों पर, सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर पर, एनर्जी और ट्रांसपोर्ट से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का विरोध’ कहते हुए खाड़ी देशो में अमरीकी सैनिक अड्डों पर ईरान द्वारा की जा रही प्रतिरोध कार्यवाही की मुखालफत कर दी। क्या यही वह संदेश था, जिसे वे ‘भारत की संसद के इस उच्च सदन से शांति और संवाद की एकजुट आवाज पूरे विश्व में जाने’ वाला बता रहे थे।
मोदी जिसे ‘यही हमारी पहचान है, यही हमारी ताकत है’ बता कर रख रहे थे, वह इस देश की पहचान कभी नहीं रही। इस तरह के वैश्विक मामलों पर भारत सरकार की इतनी लिजलिजी, इतनी डरी हुई, इतनी अमरीका, इजरायल परस्त स्थिति कभी नहीं रही। आजादी के बाद से अपनाई गयी विदेश नीति का इतना नीचा स्तर स्वयं मोदी और भाजपा स्टैण्डर्ड से भी कुछ ज्यादा ही नीचा और शर्मनाक रहा है। यह वह देश है, जिसने हमेशा साम्राज्यवादी हमलों का विरोध किया है, साथ तो कभी भी नहीं दिया । कोरिया युद्ध, क्यूबा संकट, वियतनाम युद्ध से लेकर अफ्रीका, एशिया और लातिनी अमरीकी देशो के मुक्ति आंदोलनों पर भारत ने हमेशा पीड़ित देशों का साथ दिया। आजादी के बाद से ही उसने औपनिवेशिक दासता के शिकार रहे देशों को साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही और गुट निरपेक्ष आन्दोलन जैसे ताकतवर संगठन को खड़ा करने में नेतृत्वकारी भूमिका निबाही। यह नजरिया नेताओं, सरकारों और सत्ता में बैठे दलों का नहीं था : देश का था, जो उसके द्वारा हासिल अनुभवों के बाद विकसित हुआ था। इन अनुभवों में कोई दो सदी की अंग्रेजों की गुलामी भर नहीं थी, आजादी के बाद सभी अमरीकी राष्ट्रपतियों द्वारा रची गयी भारत को कमजोर, अस्थिर, यहाँ तक कि विघटित करने की साजिशों के तजुर्बे भी शामिल थे। इन सबके चलते भारत ने दुनिया में एक हैसियत और सम्मान हासिल किया था। प्रधानमंत्री जी यही हमारी पहचान थी, यही हमारी ताकत थी। भारत की पहचान ट्रम्प से डरने-सहमने वाले की नहीं, जोन्सन, निक्सन, रीगन से होते हुए बुशों तक के सामने डट कर खड़े होने वाले की रही है। इजरायल के साथ गलबहियां करने वाले की नहीं, हमेशा फिलिस्तीन का साथ देने वाले की रही है। अलग-अलग दलों और गठबंधनों की सरकारें आने के बाद भी यह नीति बनी रही, क्योंकि यह दल-विशेष की नहीं, पूरे देश की विदेश नीति थी।

इसे समझने के लिए एक ही उदाहरण देख लेते है। 24 मार्च 2026 के मोदी के इस भाषण से ठीक 23 साल पहले 12 मार्च 2003 को भारत की संसद में उस समय के सबसे ज्वलंत मसले ईराक पर एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुआ था। उस वक़्त प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे और यह प्रस्ताव उन्हीं ने पेश किया था। इस प्रस्ताव में ईराक पर अमरीकी हमले की आशंका के मद्देनजर साफ़ कहा गया था कि “इराक में निरीक्षकों का कार्य जारी है। सुरक्षा परिषद को यह तय करना चाहिए कि आगे क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को ईराक द्वारा संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के पूर्ण अनुपालन के उद्देश्य और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए जाने वाले साधनों, दोनों पर बहुत सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। यह संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से सामूहिक निर्णय द्वारा सर्वोत्तम रूप से प्राप्त किया जा सकता है।“ इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि “यदि अधिक समय देने और स्पष्ट मानदंड तैयार करने से संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के भीतर निर्णय लेने में सुविधा होती है, तो हमारा मानना ​​है कि इस विकल्प को मौका दिया जाना चाहिए। हमें आशा है कि सुरक्षा परिषद के सदस्य अपने रुख में सामंजस्य स्थापित करेंगे ताकि उनका अंतिम निर्णय संयुक्त राष्ट्र की वैधता और विश्वसनीयता को बढ़ाए।“ उस समय भारत की संसद ने ईराक पर हमला करने की अमरीकी तैयारी का संज्ञान लेते हुए “किसी भी तरह की सैनिक कार्यवाही नहीं करने की बात कही थी।“ इसी के साथ इस प्रस्ताव में बिलकुल स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि “यदि एकतरफावाद हावी होता है, तो संयुक्त राष्ट्र को गहरा आघात लगेगा, जिसके विश्व व्यवस्था के लिए विनाशकारी परिणाम होंगे। भारत सरकार दृढ़तापूर्वक आग्रह करती है कि कोई भी सैन्य कार्रवाई न की जाए, जिसे संयुक्त राष्ट्र की सामूहिक सहमति प्राप्त न हो।“

2003 में भारत की संसद सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी थी, उसने ईराक पर लगाए गए प्रतिबंधों को भी हटाने की मांग की थी । प्रस्ताव में याद दिलाया गया था कि “भारत ने ईराक में गंभीर मानवीय स्थिति पर कई बार चिंता व्यक्त की है। ईराकी जनता एक दशक से अधिक समय से भीषण कमी और कठिनाइयों का सामना कर रही है। हमने लगातार कहा है कि यदि ईराक संबंधित सुरक्षा परिषद प्रस्तावों के प्रावधानों का पूरी तरह से पालन करता है, तो उस देश पर लगे प्रतिबंध हटा दिए जाने चाहिए।“

मौजूदा स्थितियां तो और भी ज्यादा स्पष्ट हैं। यहाँ तो और भी ज्यादा बेबाकी के साथ इससे भी आगे का रुख लिया जा सकता है। दुनिया के अनेक देश, जिनमें अमरीकी प्रभुत्व वाले नाटो और यूरोप के देश भी शामिल हैं, इस तरह का रुख सार्वजनिक रूप से ले भी रहे हैं। विश्व राजनीति में अमरीका और इजरायल जितना अलग-थलग आज है, उतना पहले कभी नहीं रहा। फिर क्या वजह है कि खुद को बड़ी अर्थव्यवस्था वाला बताने वाला, डेढ़ अरब आबादी के देश का प्रधानमंत्री अपने ही देश की अब तक की रीति-नीति पर चलने का साहस नहीं जुटा पा रहा। वाशिंगटन में ट्रम्प की घुड़की पर चुप्प लगाने, युद्ध रुकवाने के ट्रम्पियापे और ‘मोदी जानते हैं, मैं उनका राजनीतिक कैरियर चौपट कर सकता हूँ’ जैसी उसकी धमकियों के असर में खुद अपने देश की संसद में भी सच बोलने से हिचकिचा रहा है। क्या एप्सटीन की फाइल ही इसका एकमात्र कारण है? क्या गौतम अडानी के खिलाफ जारी सम्मन और गिरफ्तारी वारंट इसकी प्रमुख वजह है? नहीं!! वजह इनके साथ-साथ इनके अलावा भी है और वह जिस विचार से मोदी और उनकी पार्टी लिथड़ी हुई है, उस विचार में निहित है। 'समरथ को नहीं दोष गुंसाई' में विश्वास करने वाली यह समझदारी जिन्हें अपने से कमजोर मानती है, उन्हें निर्ममता से कुचलती है और जिन्हें अपने से ताकतवर मानती है, उनके आगे कातर भाव से नतमस्तक हो जाती है। उनकी मातहती को अपना सौभाग्य मानती है। ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद यह भाव कुछ ज्यादा ही मुखर हुआ है। मोदी जिस ‘कम बताऊं – ज्यादा छुपाऊं’ वक्तव्य को संसद में पढ़ रहे थे, उसे और भी मुक्त भाव से संघियों की आई टी सैल लिखती है और पढ़ाती है। अमरीका की बेहूदगियों और भारत के सार्वजनिक अपमान और तिरस्कार पर अपने नेता की खामोशी को ‘राजनीतिक चतुराई’ तथा टॉप क्लास डिप्लोमेसी बताती है। ऐसा करने में उसे बिलकुल भी अजीब नहीं लगता। अपने जन्म से ही उन्हें यह सब करने की आदत है : तब अंग्रेजों की आरती उतारते थे, अब अमरीका की पाद प्रदक्षिणा कर रहे हैं।

मगर इस सबसे हासिल क्या हुआ? 'हलुआ मिला न मांडे, दोऊ दीन से गए पांडे' की गत को प्राप्त होते भये। व्यापार में कोई रियायत-विरायत तो मिली नहीं, ऊपर से दुनिया भर में अलगाव और बढ़ गया। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक खबर आई है कि मौजूदा युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों में जिन तीन-चार देशों को मध्यस्थ बनाया जा रहा है, उनमें पाकिस्तान तक का नाम है। भारत कहीं नहीं है। न पढने के काफी नुक्सान होते हैं। मोदी कुनबे के लोग पढने-लिखने पर ज़रा सा भी जोर दिये होते, तो उन्होंने पिछली शताब्दी के दूसरे भाग में दुनिया पर युद्ध थोपने वाले अमरीकी राजनेता हेनरी किसिंजर का लिखा पढ़ लिया होता, जिसने लिखा था कि "अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन दोस्त होना और भी ज्यादा घातक होता है।“
खैर, इन्हें पता हो या न हो भारत की जनता को बात अच्छी तरह से पता है और वह अपनी भूमिका निबाह रही है। देश भर में विरोध कार्यवाहियां करते हुए, अन्याय के शिकार देश ईरान के प्रति हर तरह की एकजुटता दिखाते हुए और जहां संभव है, वहां सडकों पर उतरते हुए अपनी जिमेदारी पूरी कर रही है। तय है कि आने वाले दिनों में इस तरह की सक्रियताएं और बढेंगी।

*(लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94242-31650)*

*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
*Indian Council of press,Nagpur*
Journalist Cell
*All India Media Association
Nagpur*
*District President*
*Delhi Crime Press*
RNI NO : DELHIN/2005/15378
AD.Associate /Reporter
*INDIAN PRESS UNION*
District Reporter
Contact no.
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Head office:- plot no 18/19, flat no. 201,Harmony emporise, Payal -pallavi society new Manish Nagar somalwada nagpur - 440015

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