लोकेशन - रायगढ़,छत्तीसगढ़
स्लग - NTPC लारा में प्रदूषण का साया: अधिकारी बोले ‘नियंत्रण में’, जमीनी हकीकत चीख रही – काला धुआं, उड़ती धूल, सांसों पर सं
लोकेशन - रायगढ़,छत्तीसगढ़
स्लग - NTPC लारा में प्रदूषण का साया: अधिकारी बोले ‘नियंत्रण में’, जमीनी हकीकत चीख रही – काला धुआं, उड़ती धूल, सांसों पर संकट!!
एंकर - रायगढ़ के NTPC लारा सुपर थर्मल पावर प्लांट में शुक्रवार को हुई प्रेस मीट में जीएम समेत अधिकारियों ने दावा किया कि प्रदूषण नियंत्रण की सारी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। समय-समय पर पानी का छिड़काव, चिमनियों पर लगी आधुनिक मशीनें और कड़े मानकों का पालन—सब कुछ ठीक बताया गया। लेकिन प्लांट के आसपास की जमीनी हकीकत इस दावे को सीधे खारिज कर रही है।
हर तरफ घनी धूल, चिमनियों से निकलता काला जहरीला धुआं और सड़कों पर भारी वाहनों से उड़ती कोयला धूल—यह तस्वीर स्थानीय निवासियों की रोजमर्रा की सच्चाई है। सांस लेना मुश्किल हो रहा है, फसलें प्रभावित हो रही हैं और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। ग्रामीण पूछ रहे हैं—क्या NTPC के अधिकारियों को ये सब नजर नहीं आ रहा, या फिर ये समस्याएं जानबूझकर नजरअंदाज की जा रही हैं?
प्लांट से निकलने वाले भारी वाहनों के कारण सड़कों पर धूल का गुबार उठता रहता है। इससे न सिर्फ हवा प्रदूषित हो रही है, बल्कि आसपास के गांवों और खेतों पर भी इसका असर पड़ रहा है। संबंधित विभागों—चाहे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हो या स्थानीय प्रशासन—ने अब तक क्या ठोस कार्रवाई की है, यह सवाल अनुत्तरित है।
NTPC की ओर से फ्लाई ऐश ट्रांसपोर्टेशन और डस्ट सप्रेशन के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन फ्लाई ऐश के अवैध डंपिंग और ट्रांसपोर्टेशन पर छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड (CECB) ने पहले भी NTPC लारा समेत अन्य इकाइयों पर लाखों रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया है। फिर भी स्थिति में सुधार नजर नहीं आ रहा।
स्थानीय लोग पूछ रहे हैं—अगर NTPC पर कोई कार्रवाई होती है, तो प्रदूषण का असली स्रोत कहां से आ रहा है? क्या सिर्फ कागजों पर व्यवस्थाएं हैं, या हकीकत में भी उन्हें लागू किया जा रहा है? प्लांट के आसपास रहने वाले परिवारों की सेहत और पर्यावरण अब और इंतजार नहीं कर सकते।
प्रशासन और NTPC प्रबंधन को अब जिम्मेदारी लेते हुए तत्काल प्रभावी कदम उठाने होंगे—चाहे सड़कों पर नियमित स्प्रिंकलिंग और वैक्यूम क्लीनिंग हो, चिमनी उत्सर्जन पर सख्त निगरानी हो, या फ्लाई ऐश हैंडलिंग में सख्ती। वरना, कागजी दावों और जमीनी यथार्थ के बीच का फासला और बढ़ता जाएगा, जिसकी कीमत स्थानीय लोगों की सेहत और पर्यावरण को चुकानी पड़ेगी।
यह मुद्दा सिर्फ रायगढ़ का नहीं, बल्कि कोयला आधारित बिजली उत्पादन के पर्यावरणीय मॉडल पर बड़ा सवाल है। समय है—दावों से आगे बढ़कर हकीकत बदलने का।