मां काली की प्रतिमा जन्म-मृत्यु का प्रतीक है
वास्तव में ,जहां से सृष्टि पैदा होती है; वहीं प्रलय होता है. सर्किल वहीं पूरा होता है. इसलिए मां जन्म दे सकती है. शक्ति उसमें बहुत है क्योंकि शक्ति तो वहीं है, चाहे वह सृजन हो,क्रिएशन बने और चाहे विनाश हो,डिस्ट्रैक्शन बने ! जिन लोगों ने मां की धारणा के साथ सृष्टि और विनाश, दोनों को एक साथ सोचा था, उनकी दूरगामी कल्पना है. लेकिन बड़ी गहन और सत्य के बड़े निकट.
संत लाओत्से कहता है, स्वर्ग और पृथ्वी का मूल स्त्रोत वहीं है. वहीं से सब पैदा होता है लेकिन ध्यान रहे, जो मूल स्रोत होता है,वही चीजें लीन हो जाती हैं. वह अंतिम स्रोत भी होता है. यहूदी /ज्युविश परंपराएं, (यहूदी, ईसाई और इसलाम, तीनों ही ज्युविश परंपराओं का फैलाव हैं) ने जगत को एक बड़ी धारणा दी, गॉड दि फादर।यह धारणा बड़ी खतरनाक है. पुरूष के मन को तृप्त करती है क्योंकि अपने को परमात्मा के रूप में प्रतिष्ठित पाता है !
लेकिन जीवन के सत्य से उस बात का संबंध नहीं है. एक जागतिक मां की धारणा ज्यादा उचित है. पर वह तभी ख्याल में आ सकेगी, जब स्त्रैण रहस्य को, संत लाओत्से को समझ लें. अन्यथा समझ में नहीं आ सकेगी.
कभी आपने देखा है मां काली की मूर्ति को, वह मां है और विकराल, मां है और हाथ में खप्पर लिए है...! आदमी की खोपड़ी का.मां है, उसकी आंखों में सारे मातृत्व का सागर है और नीचे, वह किसी की छाती पर खड़ी है. पैरों के नीचे कोई दबा है. क्योंकि जो सृजनात्मक है, वही विध्वंसात्मक होगा. क्रिएटिविटि का दूसरा हिस्सा डिस्ट्रैक्शन है ! इसलिए जिन्होंने यह सोचा, वे बड़ी खूबी, बड़ी इमेजनेशन के, बड़ी कल्पना के लोग थे. बड़ी संभावनाओं को देखते थे. हाथ में मुर्दा आदमी की खोपड़ी है. खप्पर है, लहू टपकता है. गले में माला है खोपड़ियों की और मां की आंखें हैं और मां का ह्रदय है, जिनसे दूध बहे और वहां खोपड़ियों की माला टंगी है.
जितना ही हमने गौर से समझा, उतना ही हमें दिखाई पड़ा. एक, जन्म मिलता है स्त्री से ...तो निश्चित ही मृत्यु भी स्त्री से ही आती होगी. क्योंकि जहां से जन्म आता है वहीं से मृत्यु भी आती होगी. जहां से जन्म आया है, वहीं से जन्म खींचा भी जाएगा. काली की प्रतिमा को... काली को मां कहते हैं. वह मातृत्व का प्रतीक है और गले में मनुष्य के सिरों का हार पहने हुए है. हाथ में अभी-अभी काटा हुआ आदमी का सिर लिए हुए है, जिससे खून टपक रहा है. काली खप्पर वाली, भयानक, विकराल रूप है, सुंदर चेहरा है, जीभ बाहर निकली हुई है. भयावनी और नीचे अपने पति की छाती पर नाच रही है. इसका अर्थ हुआ की मां भी है और मृत्यु भी है. यह कहने का एक ढंग हुआ—बड़ा काव्यात्मक ढंग है! मां भी है, मृत्यु भी है. तो काली को मां भी कहते हैं और सारा प्रतीक इकट्ठा किया हुआ है.भयावनी भी है और सुंदर भी है !
*स्त्री प्रतीक है ! स्त्री का अर्थ से ‘स्त्री’ मत समझ लेना, अन्यथा सूत्र का अर्थ चूक जाएंगे. स्त्री से आप केवल यह महत्वपूर्ण बात समझना की स्त्री जन्मदात्री है! तो जहां से वर्तुल शुरू हुआ है वहीं समाप्त होगा. उदाहरण के लिए वर्षा होती है बादल से. पहाड़ों पर वर्षा हुई, हिमालय पर वर्षा हुई, गंगोतरी से जल बहा, गंगा बनी, वही समुद्र में गिरी. फिर पानी भाप बन कर उठता है बादल बन जाते हैं. वर्तुल वहीं पूरा होता है जहां से शुरू हुआ था. बादल बन कर ही वर्तुल पूरा होता है !
हर चीज वर्तुलाकार है.सब चीजें वहीं आ जाती हैं. बूढा़ फिर बच्चे जैसा हो जाता है, असहाय.जैसे बच्चा बिना दाँत के पैदा होता है, ऐसा बूढ़ा फिर बिना दाँत के हो जाता है. जैसा बच्चा असहाय होता है मां बाप को चिंता करनी पड़ती है... उठाओ, बिठाओ, खिलाओ, ऐसी ही दशा बूढ़े की हो जाती है. वर्तुल पूरा हुआ. जीवन की सारी गति वर्तुलाकार है, मंडलाकार है !
स्त्री से जन्म मिलता है तो कहीं गहरे में स्त्री से ही मृत्यु भी मिलती होगी. अब अगर स्त्री शब्द को हटा दो चीज़ें और साफ हो जाएंगी क्योंकि हमारी पकड़ यह होती है: स्त्री यानी स्त्री !
हम प्रतीक नहीं समझ पाते; हम काव्य के संकेत नहीं समझ पाते. स्त्रियों को लगेगा, यह तो उनके विरोध में वचन है और पुरूष सोचेगे, हमको पहले ही से पता था, स्त्रियां बड़ी खतरनाक हैं. यहाँ स्त्री से कोई लेना देना नहीं है. यह तो प्रतीक है, यह है तो काव्य की प्रतीक है, यह तो सूचक है जो इस प्रतीक के द्वारा कुछ कहना चाहते हैं. कहना यह चाहते हैं कि काम से जन्म होता है और काम के कारण ही मृत्यु होती है.जिस वासना के कारण देह बनती है, उसी वासना के विदा हो जाने पर देह विसर्जित हो जाती है. वासना ही जैसे जीवन है और जब वासना की ऊर्जा क्षीण हो गयी तो आदमी मरने लगता है.
बूढे का क्या अर्थ है, इतना ही अर्थ है कि अब वासना की ऊर्जा क्षीण हो गई है. अब नदी सूखने लगी है अब जल्दी ही नदी तिरोहित हो जाएगी. बचपन का क्या अर्थ है—गंगोतरी ! नदी पैदा हो रही है. जवानी का अर्थ है: नदी बाढ़ पर है. बुढ़ापे का अर्थ है, नदी विदा होने के करीब आ गई, समुद्र में मिलन का क्षण आ गया; नदी अब विलीन हो जाएगी. कामवासना से जन्म है. इस जगत में जो भी, जहां भी जन्म घट रहा है—फूल खिल रहा है, पक्षी गुनगुना रहे हैं, बच्चे पैदा हो रहे हैं, अंडे रखे जा रहे हैं. सारे जगत में सृजन चल रहा है वह काम-ऊर्जा है ! तो जैसे ही तुम्हारे भीतर से काम ऊर्जा विदा हो जाएगी, वैसे ही तुम्हारा जीवन समाप्त होने लगा, मौत आ गयी !
मौत क्या है... काम-ऊर्जा का तिरोहित हो जाना ही मौत है. इसलिए तो मरते दम तक आदमी कामवासना से ग्रसित रहता है" क्योंकि आदमी मरना नहीं चाहता इसलिए.
कामवासना के साथ वे अंत तक घिरे और पीड़ित रहते हैं. उसी किनारे को पकड़ना ही उनका सहारा है. जीवन का पर्याय है काम और काम का खो जाना है मृत्यु. इसलिए इन दोनों को एक साथ रखा है...मां काली के प्रतीक के रूप में..!!!