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दाऊद के ‘मुंबईया ठाकुर’ से 36 साल से लड़ रहा पूर्वांचल का दुबे परिवार पीठ पर वार… लेकिन कभी नहीं मानी हार

ये लड़ाई सिर्फ दो परिवारों की नहीं, बल्कि स्वाभिमान और दबंगई की है।
एक तरफ मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़ा ‘मुंबईया ठाकुर’ परिवार, जिसका कनेक्शन माफिया वरदाराजन मुदलियार और दाऊद इब्राहिम तक रहा…
तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के गोरखपुर-देवरिया से रोज़ी-रोटी कमाने मुंबई आया दुबे परिवार।



विरार: शांत गांव से माफिया की जमीन तक

आज का विरार कभी एक शांत इलाका हुआ करता था।
लेकिन 80 के दशक में मुंबई के फैलाव के साथ यहां जमीन के दाम आसमान छूने लगे… और शुरू हुआ कब्जे, दबंगई और माफिया राज का खेल।

इसी दौरान इलाके में सबसे ताकतवर नाम बना — विष्णु ठाकुर का परिवार, जो वरदाराजन मुदलियार के लिए काम करता था।
समुद्री रास्तों से तस्करी का माल उतरवाना और जमीन पर कब्जा जमाना — यही धंधा था।

बाद में उसका बेटा जयेन्द्र ठाकुर उर्फ ‘भाई ठाकुर’ इस काम का वारिस बना।
वरदाराजन के खत्म होने के बाद दाऊद इब्राहिम ने इलाके में कब्जा जमाया, और भाई ठाकुर उसका खास बन गया।



दुबे परिवार की एंट्री — और टकराव

इसी दौर में पूर्वांचल से आए नरसिंह दुबे ने भी अपना कारोबार खड़ा किया।
उनके पांच बेटों ने अलग-अलग धंधे संभाले:
• डॉ. ओम प्रकाश दुबे – नर्सिंग होम
• नरेश दुबे – बिल्डिंग मटेरियल
• जय प्रकाश – होटल बिजनेस
• श्याम सुंदर और सुरेश दुबे – रियल एस्टेट

दुबे ब्रदर्स ने विरार के आछोले में बड़ी जमीन खरीदी…
यहीं से शुरू हुआ असली टकराव।



“जो उखाड़ना है उखाड़ लो…” — और मौत की साजिश

भाई ठाकुर उस जमीन को अपने कब्जे में लेना चाहता था।
उसने सुरेश दुबे को ऑफिस बुलाया… दबाव बनाया… धमकाया।

लेकिन जवाब साफ था:
“जमीन नहीं देंगे… जो उखाड़ना है उखाड़ लो।”

यही बात भाई ठाकुर को नागवार गुजरी।



9 अक्टूबर 1989 — रेलवे स्टेशन पर खून

सुरेश दुबे को परिवार ने गांव भेजने का फैसला किया।
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।

नालासोपारा स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करते वक्त…
मानिक पाटिल के शूटरों ने ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं।
• सुरेश दुबे वहीं गिर पड़े
• एक आम यात्री भी गोली का शिकार हुआ
• शूटर फरार हो गए

उन्हें अस्पताल ले जाया गया… लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।



पुलिस, राजनीति और अंडरवर्ल्ड का खेल

हत्या के बाद दुबे परिवार ने FIR दर्ज कराने की कोशिश की…
लेकिन पुलिस उल्टा धमकाने लगी:

“एक गया है… पूरा परिवार खत्म हो जाएगा।”

नकली आरोपियों को पकड़कर केस बंद करने की कोशिश हुई।

कुछ महीनों बाद ही ठाकुर परिवार की राजनीति मजबूत हो गई:
• हितेंद्र ठाकुर विधायक बने
• ठाकुर परिवार वसई-विरार का ‘किंग’ बन गया
• रियल एस्टेट और राजनीति दोनों पर कब्जा



28 महीने बाद — न्याय की पहली किरण

1992 में DIG सुधाकर सुरादकर ने केस दोबारा खोला।
उन्होंने पाया:
• पुलिस अंडरवर्ल्ड के इशारे पर काम कर रही थी
• 17 लोगों को TADA में गिरफ्तार किया गया
• इसमें भाई ठाकुर, हितेंद्र ठाकुर और कई पुलिस अफसर शामिल थे

लेकिन कुछ साल बाद सभी आरोपी बरी हो गए।



सुप्रीम कोर्ट की एंट्री

दुबे परिवार झुका नहीं… लड़ाई जारी रखी।

2000 में सुप्रीम कोर्ट ने:
• कई आरोपियों की बरी होने का फैसला पलटा
• 6 लोगों की सजा बरकरार रखी

मामला पुणे ट्रांसफर हुआ।



23 साल जेल… और फिर 2023 में रिहाई

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2023 में
भाई ठाकुर समेत सभी आरोपी बरी हो गए।

लेकिन दुबे परिवार ने फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी।



2024 — राजनीति में पलटवार

36 साल बाद कहानी ने करवट ली।
• सुरेश दुबे के परिवार की बहू स्नेहा दुबे (पंडित) ने
हितेंद्र ठाकुर को चुनाव में हरा दिया
• नालासोपारा से क्षितिज ठाकुर भी हार गए

👉 1990 के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि
ठाकुर परिवार का कोई भी सदस्य सत्ता में नहीं रहा।



निष्कर्ष

ये कहानी सिर्फ हत्या या गैंगवार की नहीं…
ये कहानी है:
• स्वाभिमान की
• न्याय के लिए जिद की
• और 36 साल तक बिना झुके लड़ने की

पीठ पर वार हुए… अपनों को खोया…
लेकिन दुबे परिवार ने कभी हार नहीं मानी।

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