श्री राम नवमीं पर हार्दिक शुभकामनाएं,
साथ ही आज के राम भक्तों पर अपनी रचना के द्वारा उनकी थोथी भक्ति पर प्रहार
राम न कोई नारा हैं, न वोट बैंक की जागीर,
राम तो मन की निर्मलता हैं, शबरी की तकदीर।
पर आज गली के नुक्कड़ पर, कुछ ढोंगी शोर मचाते हैं,
राम के नाम की चादर ओढ़, अपनी रोटियां सेंकते जाते हैं।
तुम राम की बात तो करते हो, क्या राम को पहचाना है?
क्या पिता का वचन निभाने को, तुमने राजपाट को त्यागा है?
राम ने तो केवट को गले लगाया, कोल-भीलों को मान दिया,
तुमने तो कुर्सी की खातिर, भाई-भाई को बांट दिया।
बगल में राम की फोटो है, और मन में सत्ता का लालच,
तुम भक्ति का ढोंग रचाते हो, फैलाकर नफरत का कीचड़।
मर्यादा की वो मूर्ति थे, तुम अभद्रता का चोला हो,
मुख में उनके अमृत था, तुम नफरत का गोला हो।
राम का नाम जुबां पर है, पर भीतर भरा कसाई है,
तुमने तो प्रभु के मंदिर में भी, नफरत की ईंट लगाई है।
वो पत्थर पर तर जाते थे, तुम पत्थरों पर लड़वाते हो,
राम के आदर्शों को छोड़, बस चुनावी झंडे फहरवाते हो।
तुम क्या जानो राम का दुःख, जिसने नंगे पैर वन नापा था,
तुम्हारी सियासत की गर्मी से, तो सरयू का जल भी कांपा था।
तिलक लगाकर माथे पर, तुम खुद को राम बताते हो,
पर कर्म तुम्हारे रावण से, तुम किसको मूर्ख बनाते हो?
राम मिलेंगे त्याग में, तप में, दीन-दुखी की सेवा में,
राम नहीं मिलने वाले, सत्ता के मीठे मेवा में।
जो राम का नाम भुनाते हैं, वो भक्ति नहीं, बस छल है,
मर्यादित राम सूरज हैं, और तुम्हारी सियासत काली रात का पल है।
*"राम सत्ता के भूखे नहीं, वो तो प्रेम के प्यासे हैं,*
*तुम जो राम-राम जपते हो, वो बस तुम्हारे चुनावी पासे हैं।"*
कुंवर प्रताप यादवेंद्र सिंह यादव चंद्रवंशी उर्फ टाईगर भईया राष्ट्रीय अध्यक्ष वसुधैव कुटुंबकम्