कहानी जिस पक्ष से सुनोगे ,उसी पक्ष से सत्य लगेगी - विजय तिवारी
मानव समाज में सत्य की परिभाषा हमेशा एक जैसी नहीं रही है। अक्सर हम जिस दृष्टिकोण से किसी घटना को देखते या सुनते हैं, वही हमें सही प्रतीत होता है। यही कारण है कि कहा जाता है— “कहानी जिस पक्ष से सुनोगे, उसी पक्ष की सत्य लगेगी।” यह वाक्य न केवल हमारे सोचने के तरीके को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि सत्य कभी-कभी एकांगी नहीं होता, बल्कि बहुआयामी होता है।
जब भी कोई घटना घटती है, उसमें कई पात्र होते हैं और हर पात्र का अपना अनुभव, भावना और तर्क होता है। उदाहरण के लिए, एक ही विवाद में एक व्यक्ति खुद को सही और दूसरे को गलत मान सकता है, जबकि दूसरा व्यक्ति भी उसी विश्वास के साथ अपनी बात रखता है। दोनों की कहानियाँ अलग-अलग होती हैं, और जो भी व्यक्ति जिस पक्ष की बात पहले या ज्यादा गहराई से सुनता है, उसका मन उसी के पक्ष में झुक जाता है।
यह स्थिति केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, राजनीति और मीडिया में भी देखने को मिलती है। समाचार चैनल, सोशल मीडिया या अफवाहें—सब अपने-अपने तरीके से घटनाओं को प्रस्तुत करते हैं। जब हम केवल एक ही स्रोत से जानकारी लेते हैं, तो हमारा दृष्टिकोण सीमित हो जाता है और हम उसी को पूर्ण सत्य मान बैठते हैं।
वास्तव में, सच्चाई को समझने के लिए जरूरी है कि हम हर पक्ष को सुनें, तथ्यों का विश्लेषण करें और अपने विवेक का उपयोग करें। केवल एक पक्ष को सुनकर निर्णय लेना कई बार हमें भ्रमित कर सकता है। न्याय की भावना भी यही कहती है कि दोनों पक्षों को समान अवसर दिया जाए, तभी सही निष्कर्ष निकल सकता है।
इस कथन का एक गहरा मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। मनुष्य स्वभाव से ही अपने विचारों और भावनाओं से जुड़ी बातों को अधिक महत्व देता है। इसलिए जब कोई कहानी हमारे विचारों से मेल खाती है, तो हम उसे आसानी से सत्य मान लेते हैं। यह हमारी सोच की एक सीमा भी है, जिसे समझना और सुधारना आवश्यक है।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि सत्य को समझने के लिए हमें निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाना होगा। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हर कहानी के दो या उससे अधिक पहलू हो सकते हैं। जब हम सभी पक्षों को समझने की कोशिश करते हैं, तभी हम वास्तविक सत्य के करीब पहुँच पाते हैं।