एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी से सटीक इलाज और तेज रिकवरी का नया रास्ता
हल्दवानी: पीठ दर्द के इलाज में लंबे समय तक ओपन सर्जरी को ही प्रमुख विकल्प माना जाता रहा है, जिसमें बड़े चीरे और लंबी रिकवरी शामिल होती है। लेकिन एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी ने इस सोच को बदल दिया है। यह एक हाई-प्रिसिशन और टिश्यू-स्पेयरिंग तकनीक है, जिसमें हाई-डेफिनिशन कैमरा और माइक्रो इंस्ट्रूमेंट्स की मदद से सर्जन रीढ़ तक बहुत छोटे, अक्सर एक सेंटीमीटर से भी कम चीरे के जरिए पहुंचते हैं। इसका उद्देश्य स्पष्ट है—न्यूरल स्ट्रक्चर्स पर दबाव को कम करना और समस्या का समाधान करना, साथ ही आसपास की मांसपेशियों, लिगामेंट और हड्डियों को अधिकतम सुरक्षित रखना।
इस तकनीक के केंद्र में स्पाइनल एंडोस्कोप होता है, जो एक पतली ट्यूब के रूप में कैमरा, लाइट सोर्स और वर्किंग चैनल से लैस होता है। सर्जरी के दौरान लगातार सलाइन इरिगेशन से ऑपरेटिव एरिया साफ रहता है और ब्लीडिंग भी कम होती है। फ्लोरोस्कोपी या एंडोस्कोपिक गाइडेंस के तहत सर्जन शरीर के नेचुरल एनाटॉमिकल पाथवे के जरिए बेहद सटीक तरीके से आगे बढ़ते हैं।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रिंसिपल डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. प्रांकुल सिंघल ने बताया “एंडोस्कोपिक तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से लम्बर डिस्क हर्निएशन, फोरामिनल स्टेनोसिस और कुछ मामलों में स्पाइनल कैनाल स्टेनोसिस के इलाज में किया जाता है। चुने हुए मामलों में सर्वाइकल या थोरासिक डिस्क से जुड़ी समस्याओं में भी यह प्रभावी हो सकती है। इस प्रक्रिया में न्यूरल डीकम्प्रेशन किया जाता है, जबकि पैरास्पाइनल मसल्स को लगभग बिना छेड़े रखा जाता है, जिससे ऑपरेशन के बाद दर्द कम होता है और मरीज जल्दी चल-फिर पाता है। क्लिनिकल दृष्टिकोण से देखें तो कम टिश्यू डैमेज का सीधा लाभ मरीज को मिलता है—पोस्ट-ऑपरेटिव दर्द कम होता है, ब्लड लॉस न्यूनतम रहता है और अस्पताल में रहने की अवधि भी घट जाती है। कई मामलों में यह सर्जरी रीजनल एनेस्थीसिया और कॉन्शियस सेडेशन के साथ की जाती है, जो बुजुर्ग या अन्य बीमारियों से ग्रस्त मरीजों के लिए खास तौर पर फायदेमंद है। मरीज अक्सर कुछ ही घंटों में चलना शुरू कर देते हैं और छोटा चीरा होने के कारण निशान भी बहुत कम दिखाई देता है। सबसे अहम बात यह है कि रीढ़ की स्थिरता काफी हद तक बरकरार रहती है, जिससे ओपन सर्जरी में होने वाले संभावित जटिलताओं का जोखिम कम हो जाता है।“
हालांकि, एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है। जटिल विकृति, अस्थिरता जिसमें फ्यूजन की जरूरत हो, संक्रमण या कैंसर जैसे मामलों में पारंपरिक सर्जरी अधिक उपयुक्त रहती है। सही मरीज का चयन बेहद महत्वपूर्ण है, जहां रेडियोलॉजिकल फाइंडिंग्स और क्लिनिकल लक्षणों में स्पष्ट तालमेल होना चाहिए। बिना सोचे-समझे इसका उपयोग करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकते।
आने वाले समय में, जैसे-जैसे इंस्ट्रूमेंट्स में सुधार होगा और सर्जनों की ट्रेनिंग और अधिक संरचित होगी, एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी का उपयोग और बढ़ने की संभावना है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे सही मरीजों में, सटीक तकनीक और शरीर की एनाटॉमी की गहरी समझ के साथ अपनाया जाए। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर यह मरीजों को कम शारीरिक तनाव के साथ प्रभावी राहत देने का एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रही है।