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“10,000 में बिकता सिस्टम: क्या यही है ‘सुशासन’?”



भारत में भ्रष्टाचार अब कोई छुपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि एक खुला ज़हर बन चुका है।

नालंदा में एक BCMO का ₹10,000 की रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाना कोई अलग घटना नहीं, बल्कि उस सड़े हुए सिस्टम की झलक है जहाँ हर फाइल की कीमत तय है।
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, बिहार की यह कार्रवाई सराहनीय जरूर है, लेकिन सवाल यह है कि:
जो नहीं पकड़े गए, उनका क्या?
जब एक स्वास्थ्य अधिकारी जन्म तिथि सुधारने जैसे सामान्य कार्य के लिए रिश्वत मांगता है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं—यह गरीब और आम आदमी के अधिकारों की हत्या है।
और यहीं से यह मामला और भी गंभीर हो जाता है…
क्या यह सिर्फ लापरवाही है?
या फिर यह एक संगठित भ्रष्टाचार का नेटवर्क है?
अगर एक अधिकारी छोटी रिश्वत में पकड़ा जाता है, तो यह मान लेना चाहिए कि सिस्टम के भीतर करोड़ों के खेल चल रहे हैं।
निष्कर्ष:
अब वक्त आ गया है:
हर विभाग की CBI/न्यायिक जांच,
दोषियों की तत्काल बर्खास्तगी,
पीड़ितों को न्याय और मुआवजा,
वरना “सुशासन” सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा।

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