विंध्यनगर स्थित डी पॉल स्कूल की अमानवीय करतूत आई सामने, ₹50 की फीस के लिए बच्चों को घोषित किया 'डिफाल्टर'
विंध्यनगर, सिंगरौली:
एक तरफ देश और प्रदेश की सरकारें 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'हर बच्चे के लिए शिक्षा' जैसे नारों के साथ शिक्षा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने का दावा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ निजी स्कूल इन दावों की धज्जियां उड़ाते हुए शिक्षा को एक शुद्ध व्यापार में तब्दील कर चुके हैं। ऐसा ही एक ताजा और शर्मनाक मामला विंध्यनगर स्थित प्रतिष्ठित 'डी पॉल स्कूल' से सामने आया है।
दरअसल, सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक सूची ने डी पॉल स्कूल की संवेदनहीनता और अमानवीय रवैये को उजागर कर दिया है। यह सूची स्कूल द्वारा जारी की गई 'फीस डिफाल्टर लिस्ट' (Fee Defaulter List) है, जो सत्र 2025-2026 के लिए 1 अप्रैल 2026 तक की बताई जा रही है। इस सूची को ध्यान से देखने पर यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह स्कूल एक शिक्षण संस्थान है या फिर एक ऐसी फैक्ट्री, जहां सिर्फ मुनाफे का गणित चलता है और बच्चों को एक व्यापारिक वस्तु (कमोडिटी) की तरह देखा जा रहा है।
अमानवीयता की सारी हदें पार: ₹50 के लिए भी डिफाल्टर!
इस कथित 'डिफाल्टर' सूची ने अमानवीयता की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। सूची में कक्षा 7वीं-A के कई छात्रों के नाम शामिल हैं। हैरानी और शर्म की बात यह है कि इनमें से कुछ छात्रों के नाम सिर्फ ₹50 की मामूली बकाया फीस के कारण इस काली सूची में डाल दिए गए हैं। सूची के सीरियल नंबर 2, 8, 9 और 10 पर अंकित छात्रों के नाम के आगे बकाया राशि मात्र 50 रुपये लिखी हुई है।
अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल ₹50 के लिए किसी बच्चे का नाम सार्वजनिक रूप से डिफाल्टर की सूची में डालना उचित है? क्या स्कूल प्रबंधन को यह एहसास नहीं है कि ऐसी कार्रवाई से उन मासूम बच्चों के आत्मसम्मान और मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? क्या यह कदम बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने जैसा नहीं माना जाएगा?
शिक्षा या व्यापार? उठ रहे गंभीर सवाल
शिक्षाविदों और अभिभावकों का मानना है कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि स्कूल प्रबंधन की संवेदनहीन और पूर्णतः व्यापारिक मानसिकता का उदाहरण है। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि कुछ निजी संस्थानों के लिए बच्चों की शिक्षा और उनका सम्मान सर्वोपरि नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक लाभ ही मुख्य प्राथमिकता बन गया है।
उनका कहना है कि स्कूल एक विद्या का मंदिर होना चाहिए, जहां बच्चों का व्यक्तित्व और आत्मविश्वास विकसित हो, न कि ऐसा स्थान जहां छोटी-सी राशि के लिए उन्हें सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाए।
जिला प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की कथित निष्क्रियता और चुप्पी को लेकर सामने आ रहा है। स्थानीय लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि ऐसे मामलों की जानकारी होने के बावजूद अक्सर कोई ठोस और त्वरित कार्रवाई नहीं की जाती।
लोगों का कहना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और संवेदनशीलता बनाए रखनी है, तो प्रशासन को ऐसे मामलों पर तुरंत संज्ञान लेकर जिम्मेदार संस्थानों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे।
व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह
यह मामला केवल एक स्कूल की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि व्यापक शिक्षा व्यवस्था की उन खामियों को भी उजागर करता है, जहां शिक्षा सेवा के बजाय व्यवसाय का रूप लेती जा रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम सच में "पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया" का सपना साकार कर पाएंगे, यदि बच्चों का सम्मान मात्र ₹50 के लिए दांव पर लगा दिया जाए?
Collector Office Singrauli CM Madhya Pradesh DEO SINGRAULI