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शांतिभंग में दनादन जेल पर हाईकोर्ट सख्त, बनाई जांच समिति, तलब हुए एक साथ 14 एसीपी*

*शांतिभंग में दनादन जेल पर हाईकोर्ट सख्त, बनाई जांच समिति, तलब हुए एक साथ 14 एसीपी*


यूपी के अलग अलग जिलों में पुलिस की अलग अलग तरह की मनमानी चल रही है।शांतिभंग में किसी को भी जेल भेज दिया जाता है। मुचलका दाखिल करने का अवसर तक प्रदान नहीं किया जाता है। थाना प्रभारी चालान के समय जेल भेजने की संस्तुति कर देते हैं। आगरा के अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश जेजे मुनीर से इसे लेकर शिकायत की थी। हाईकोर्ट के निर्देश पर जांच समिति बनाई गई है। सोमवार को विशेष न्यायाधीश (ईसी ऐक्ट) ज्ञानेंद्र राव ने कमिश्नेरट के 14 एसीपी तलब किए। पेशी के दौरान उनसे स्पष्टीकरण मांगा। अब यह मामला तूल पकड़ सकता है। जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट भेजी जाएगी।

अधिवक्ताओं ने पिछले दिनों आगरा आए हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एवं आगरा परिक्षेत्र के प्रशासनिक न्यायाधीश जेजे मुनीर से पुलिस कार्यप्रणाली की शिकायत की थी। आरोप लगाया था कि एसीपी को कार्यपालक मजिस्ट्रेट शक्ति मिलने का दुरुपयोग हो रहा है। किसी को भी जेल भेज दिया जाता है। प्रशासनिक न्यायाधीश जेजे मुनीर ने शांतिभंग में जेल न भेजने के पुलिस को निर्देश दिए थे। हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले पर संज्ञान लिया। एक जांच समिति का गठन किया गया।

इसमें आगरा के विशेष न्यायाधीश ईसी ऐक्ट ज्ञानेंद्र राव को जांच अधिकारी बनाया गया। उन्होंने सोमवार को कमिश्नरेट के विभिन्न सर्किलों में तैनात 14 एसीपी को तलब किया। सभी को नोटिस भेजे गए थे। उनसे लोगों को शांतिभंग में जेल भेजने की वजह पूछी गई। लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया। पूछा गया कि लोगों के मूल अधिकारों का उल्लंघन क्यों हुआ है। जबकि शांतिभंग आदि के आरोप में मुचलका व जमानत पर आरोपित को रिहा किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के यह आदेश हैं।

पुलिस ने कितने जमानतियों का सत्यायन कराया। सत्यापन नहीं कराया तो किस आधार पर जमानत स्वीकृत की। इन सवालों ने एसीपी के पेशानी पर बल ला दिए। सूत्रों की मानें तो एसीपी को यह नसीहत भी दी गई कि वे अपने कोर्ट में पुलिस अधिकारी की तरह नहीं, बल्कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट की तरह सोचें और फैसला लें। जिससे किसी के मूल अधिकारों का हनन नहीं हो।

*जेल भेजने वालों में कई बुजुर्ग भी शामिल*

आगरा कमिश्नरेट में एक जनवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 के बीच 59 दिन में एसीपी कोर्ट से 493 आरोपियों को शांतिभंग में जेल भेजा गया। इनमें कई बुजुर्ग भी शामिल थे। एसीपी कोतवाली, एसीपी लोहामंडी और एसीपी अछनेरा की कोर्ट से सबसे ज्यादा लोगों को जेल भेजा गया। पूरा रिकार्ड कोर्ट में तलब किया गया है। विस्तृत जांच चल रही है। पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि शांतिभंग में कार्रवाई से अपराध का ग्राफ कम हुआ है। बलवे, जानलेवा हमले की घटनाओं में कमी आई है। उन्हीं लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है जिनके तत्काल छूटने पर माहौल बिगड़ सकता था।

*अधिवक्ता को कर दिया गया पाबंद*


कलक्ट्रेट बार के महासचिव अधिवक्ता लोकेंद्र शर्मा को जगदीशपुरा थाना पुलिस ने धारा 126/135 (पूर्व धारा 107/116) के तहत पाबंद कर दिया। 20 जनवरी 2026 को नोटिस मिलने पर उन्हें इस बात की जानकारी हुई। अधिवक्ता ने इस संबंध में सत्र न्यायालय में रिवीजन प्रस्तुत किया है। लोकेंद्र शर्मा ने बताया कि यह पुलिस की मनमानी है। उनके संबंध में कोर्ट ने मूल पत्रावली तलब की है।

*शिकायतकर्ता भी बयान को बुलाए गए*

कोर्ट में जांच के लिए बयान के लिए शिकायत कर्ता को भी बुलाया गया है। उन्हें भी नोटिस भेजा गया है। एक पीड़ित ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से शिकायत की थी। पीड़ित पक्ष को भी अपने बयान दर्ज कराने है।

*क्या कहते हैं अधिवक्ता*

वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक शर्माः कानून-व्यवस्था बनाने को शांतिभंग की कार्रवाई होती है। इसमें कमिश्नरेट के एसीपी को आरोपित से मुचलका व जमानत लेकर रिहा करना चाहिए, क्योंकि यह कार्रवाई केवल पाबंद करने तक सीमित है। ऐसे में जेल भेजने का औचित्य नहीं है। सात साल से कम सजा में जेल नहीं भेजना चाहिए।

*महासचिव कलक्ट्रेट बार एसोसिएशन लोकेंद्र शर्माः*

जनता का शोषण हो रहा है। एक वर्ष में चार से 5000 लोगों को शांतिभंग के आरोप में जेल भेजा जा चुका है, जबकि सात साल से कम सजा में जेल भेजने का प्रावधान नहीं है। कमिश्नरेट बनने के बाद से उत्पीड़न बढ़ा है। जमानत के दस्तावेजों में खसरा-खतौनी स्वीकार नहीं हो रहे हैं।

*वरिष्ठ अधिवक्ता कलक्ट्रेट विनोद पांडेयः* हाईकोर्ट के निर्देशों का सही पालन नहीं हो रहा है। शांतिभंग की कार्रवाई के नाम पर मनमानी हो रही है व जनता का उत्पीड़न हो रहा है। यह जमानती अपराध है, इसलिए सामान्य स्थिति में किसी को जेल नहीं भेजा जाना चाहिए। पुलिस अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है।

*अपर जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) मंगल सिंह उपाध्यायः* शांतिभंग में आरोपितों को जेल भेजने के मामले में न्यायालय ने संज्ञान लिया है। इसमें सात साल से कम सजा का प्रावधान है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार ऐसे मामलों में गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट के संज्ञान के बाद विशेष न्यायाधीश ज्ञानेंद्र राव इसकी जांच कर रहे हैं। सोमवार को कमिश्नरेट के 14 एसीपी को न्यायालय में तलब कर स्पष्टीकरण मांगा गया।

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