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“त्योहार नहीं, जिम्मेदारी की परीक्षा है रामनवमी”

विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

गया के शेरघाटी अनुमंडल में जिला प्रशासन द्वारा बुलाई गई शांति समिति की बैठक केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरी चेतावनी और अवसर दोनों है। रामनवमी जैसे आस्था के पर्व को जिस तरह आज प्रशासनिक निगरानी और सुरक्षा कवच की जरूरत पड़ रही है, वह अपने आप में समाज के बदलते स्वरूप का आईना है।
सवाल यह है कि क्या हम इतने कमजोर हो गए हैं कि भगवान राम के जन्मोत्सव को मनाने के लिए हमें पुलिस बल और प्रशासनिक बैठकों का सहारा लेना पड़े? क्या “मर्यादा पुरुषोत्तम” के आदर्शों को मानने वाले समाज में मर्यादा बनाए रखने के लिए आदेश और निर्देश जारी करने पड़ेंगे?
प्रशासन ने बैठक कर अपनी जिम्मेदारी निभा दी—सुझाव लिए, सुरक्षा का खाका तैयार किया, अफवाह फैलाने वालों पर सख्ती की चेतावनी दी। लेकिन क्या सिर्फ प्रशासन की तैयारी ही पर्याप्त है?
सच्चाई यह है कि असली परीक्षा प्रशासन की नहीं, समाज की है।
हर वर्ष त्योहारों के दौरान तनाव, जुलूसों में उन्माद, और सोशल मीडिया पर जहर घोलने वाली अफवाहें यह साबित करती हैं कि हमने त्योहारों को आस्था से ज्यादा प्रदर्शन और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बना दिया है।
रामनवमी, जो मर्यादा, संयम और धर्म के पालन का प्रतीक है, वही अगर अहंकार और टकराव का मंच बन जाए—तो यह सीधे-सीधे भगवान राम के आदर्शों का अपमान है।
शांति समिति की बैठकों में अक्सर वही चेहरे दिखते हैं, वही आश्वासन दिए जाते हैं—“हम सहयोग करेंगे, शांति बनाए रखेंगे।”
लेकिन जमीन पर वही पुरानी कहानी दोहराई जाती है—
छोटी सी अफवाह, एक भड़काऊ नारा, और फिर पूरे शहर का माहौल बिगड़ जाता है।
प्रश्न यह भी है:
क्या शांति केवल बैठकों से आएगी, या मानसिकता बदलने से?
प्रशासन को चाहिए कि वह केवल बैठक तक सीमित न रहे, बल्कि:
संवेदनशील क्षेत्रों में कड़ी निगरानी रखे
सोशल मीडिया पर फर्जी खबर फैलाने वालों पर तुरंत कार्रवाई करे
जुलूसों में नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराए
लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है समाज का आत्ममंथन।
रामनवमी मनाने का असली अर्थ क्या है?
क्या यह सिर्फ DJ, जुलूस और शक्ति प्रदर्शन है?
या फिर यह अपने भीतर के “राम” को जागृत करने का दिन है—जहां सत्य, धैर्य और मर्यादा सर्वोपरि हों?
आज जरूरत है कि हर नागरिक खुद से सवाल पूछे—
क्या मैं इस पर्व को शांतिपूर्ण बनाने में योगदान दे रहा हूं, या अनजाने में तनाव बढ़ाने का कारण बन रहा हूं?
निष्कर्ष साफ है:
अगर इस बार रामनवमी शांति और सौहार्द के साथ संपन्न होती है, तो यह प्रशासन की नहीं, बल्कि समाज की जीत होगी।
और अगर कहीं भी माहौल बिगड़ा—तो जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं, हम सबकी होगी।
“राम का नाम लेने से पहले, राम के आदर्शों को अपनाना होगा—वरना त्योहार नहीं, सिर्फ भीड़ रह जाएगी।”

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