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शाहपुर पटोरी: अतिक्रमण मुक्ति का 'दिखावा' और अवैध वसूली का 'जाम' ।

"तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़ा झूठे हैं ये दावा किताबी है"।

बिहार में इन दिनों सड़कों को अतिक्रमण मुक्त करने का एक महा-अभियान चल रहा है। कागजों पर इसका उद्देश्य आम आदमी को जाम से निजात दिलाना और सुगम यातायात सुनिश्चित करना है।

इसी कड़ी में समस्तीपुर जिले के शाहपुर पटोरी नगर परिषद में भी प्रशासन का बुलडोजर गरजा। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह अभियान वाकई जनहित के लिए था, या सिर्फ 'खानापूर्ति' कर सस्ती लोकप्रियता बटोरने का एक जरिया?

चकाचौंध के पीछे की कड़वी सच्चाई ये है कि पटोरी की सड़कों पर प्रशासन ने अपनी सहूलियत के हिसाब से तोड़-फोड़ तो कर दी, लेकिन धरातल पर स्थिति नहीं बदली। अभियान के नाम पर गरीब रेहड़ी-पटरी वालों को हटा देना आसान है, लेकिन जाम की असली जड़—"अवैध स्टैंड और मनमानी वसूली"—पर आज भी प्रशासन की चुप्पी संदेहास्पद है।

शाहपुर पटोरी के मुख्य चौराहे, चाहे वह "चंदन चौक" हो या "कवि चौक" (जहां ऑटो स्टैंड अब तक चिन्हित नहीं है) अराजकता का केंद्र बन चुके हैं। रेलवे परिसर में ऑटो स्टैंड का ठेका होना समझ में आता है, लेकिन नगर परिषद के मुख्य चौराहों पर सरेआम ऑटो रोककर, डरा-धमकाकर रसीद काटना और अवैध वसूली करना किस कानून के दायरे में आता है?
यह प्रक्रिया न केवल अवैध है, बल्कि व्यस्त समय में भीषण जाम का सबसे बड़ा कारण भी है।

प्रशासन की नाक के नीचे 'गुंडागर्दी'
हैरानी की बात यह है कि जहाँ यह सब हो रहा है, वहीं एसडीएम (SDM) और डीएसपी (DSP) जैसे आला अधिकारी बैठते हैं। चंदन चौक पर ही थाना स्थित है। प्रशासन की नाक के नीचे चल रही इस 'सरेआम वसूली' ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:

दूसरी और अहम बात ये है कि आज नाबालिक के हाथ में गाड़ी है जिसके पास ना तो ड्राइविंग लाइसेंस है ना ही गार्डियन के तरफ से रोक थाम, ना ही प्रशाशन का डर ।

अब सवाल उठता है :

क्या प्रशासन वाकई इस स्थिति से अनजान है, या जानबूझकर मौन साधे हुए है?

या फिर क्या 'पैसे की ताकत' ने कानून की आंखों पर पट्टी बांध दी है?


क्या आम आदमी की परेशानी (एंबुलेंस का फंसना, स्कूली बच्चों की देरी) अधिकारियों के लिए कोई मायने नहीं रखती?

जन प्रतिनिधियों की 'कमीशन' वाली राजनीति से बेहाल पटोरी

पटोरी का दुर्भाग्य यह भी है कि यहाँ के जन प्रतिनिधि जनता की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने के बजाय बड़ी योजनाओं के "कमीशन" के फेर में उलझे रहते हैं। चुनाव के समय किए गए बड़े-बड़े वादे अब महज "चुनावी जुमले" साबित हो रहे हैं। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में मौन समर्थन देने लगे, तो जनता अपनी गुहार लेकर किसके पास जाए?

अतिक्रमण हटाना सिर्फ सड़कों के किनारे के छप्पर तोड़ देना नहीं है, बल्कि उस तंत्र को तोड़ना है जो सड़क पर अराजकता पैदा करता है। शाहपुर पटोरी को आज एक ऐसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले अधिकारी की जरूरत है जो इन अवैध वसूली करने वाले गिरोहों पर नकेल कस सके और शहर को वास्तविक रूप से "जाम मुक्त" बना सके। वरना, यह महा-अभियान केवल जनता को परेशान करने का एक नया तरीका बनकर रह जाएगा ।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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