logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

हेमंत सोरेन के बयान पर बवाल ,देशव्यापी बहस: सच, आस्था और व्यवस्था का टकराव-

हाल ही में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा सदन में दिए गए बयान ने पूरे देश में तीखी बहस को जन्म दे दिया है। समाज के विभिन्न वर्गों में इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। एक ओर कुछ लोग उनके बयान का समर्थन कर रहे हैं, तो दूसरी ओर एक वर्ग इस पर आक्रामक प्रतिक्रिया देते हुए व्यक्तिगत स्तर तक उतर आया है। हेमंत सोरेन का बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि वह वर्तमान सामाजिक और नीतिगत दिशा पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न था। उनके शब्दों में व्यवस्था की वह सच्चाई झलकती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। उन्होंने समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या हम वास्तव में प्रगति की दिशा में बढ़ रहे हैं या केवल आस्था के नाम पर वास्तविक मुद्दों से भटक रहे हैं। उनके बयान के बाद जो प्रतिक्रियाएँ सामने आईं, वह हमारे समाज के एक चिंताजनक पहलू को उजागर करती हैं। संवाद और तर्क के स्थान पर गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमले हावी हो गए। यह स्थिति दर्शाती है कि हम विचारों से अधिक भावनाओं के अधीन हो चुके हैं, जहाँ असहमति को सहन करने की क्षमता कम होती जा रही है।
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए महाभारत के पात्र धृतराष्ट्र और गांधारी का उदाहरण अत्यंत प्रासंगिक है। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, लेकिन गांधारी ने स्वयं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। यह प्रतीक है उस मानसिकता का, जहाँ व्यक्ति सच देखने की क्षमता होते हुए भी उसे नजरअंदाज करता है।परिणाम एक साम्राज्य का खात्मा।
आज का समाज भी कहीं न कहीं उसी स्थिति में खड़ा दिखाई देता है—जहाँ सच को देखने से बचा जा रहा है और सुविधा के अनुसार वास्तविकता को अनदेखा किया जा रहा है।
हेमंत सोरेन ने यह भी इंगित किया कि देश के प्रभावशालीऔर संपन्न वर्ग अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज रहे हैं। यह एक गंभीर प्रश्न उठाता है—यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत है, तो फिर यह पलायन क्यों? दूसरी ओर, यदि नीति-निर्माता शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों के बजाय केवल धार्मिक संरचनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो यह दीर्घकालिक विकास के लिए घातक साबित हो सकता है। इतिहास गवाह है कि जब कोई राष्ट्र अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए बाहरी देशों पर निर्भर होने लगता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है। आज हम धीरे-धीरे शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक उपभोग की वस्तुओं के लिए अन्य देशों पर निर्भर होते जा रहे हैं।
यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी की ओर भी संकेत करती है।
हेमंत सोरेन का बयान केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं या नहीं। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि उसमें असहमति और आलोचना के लिए स्थान हो।
हेमंत की बातें आज सत्ता पर काबिज लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो विद्यालयों को बन्द कर मन्दिरों की व्यवस्था मे लगे हुए हैं और लोगों को अंधा बनाने या आँखे बन्द रखने पर विवस कर रहे है।बडे बडे साम्राज्य जब रोज मर्रा की जिन्दगी के लिये आयातित वस्तुओं पर निर्भर होने लग जाये , जब हमारे अंदर की निर्णय करने की शक्ति खत्म हो जाये दुसरे देश हमारे लिये निर्णय करने लग जाये तो उस साम्राज्य का बिखरना निश्चित है।यही गुलामी है ।अभी हमारे देश मे स्वशासन की प्रक्रिया 100 साल भी नही हुई की हम आज फिर से उसी गुलामी- व्यवस्था को न्योता देने मे लग गये है।
हेमंत सोरेन ने नीति निर्णायकों के मुँह पर करारा तमाचा जड़ दिया है। आज के समय मे सत्ता पर बैठ लोगों को सच स्वीकार नही है। आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि क्या हम सच को सुनने और समझने के लिए तैयार हैं। हेमंत सोरेन ने एक बहस की शुरुआत की है—अब यह समाज और नीति-निर्माताओं पर निर्भर करता है कि वे इसे किस दिशा में ले जाते हैं। यदि हम आँखें बंद करके चलेंगे, तो भविष्य अनिश्चित होगा। लेकिन यदि हम सच्चाई का सामना करने का साहस जुटाएँगे, तो यही बहस देश को एक नई दिशा दे सकती है।
ट्रू गाँधीयन ग्रुप पिछले 2 सालों से इसी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर रही है।लोगों को सच्चाई से अवगत कराने का काम कर रही है।पुरा विश्व जब युद्ध की अंधेरी खाई मे एक दुसरे को धकेलने का काम कर रही है वैसे मे गाँधी की सोच और उनके मूल्यों को अपनाकर विश्व मे शान्ती की अलख जलानें के लिये हम सबों को आगे आने की जरुरत है।
सीनियर जर्नलिस्ट
शिव भक्त
नरेंद्र

4
773 views

Comment