इतिहास का वो दर्दनाक सच, जिसे हम भूल चुके हैं”
आज मैं आपको भारत के इतिहास के उस सबसे खौफनाक और अनसुने पन्ने पर ले चलता हूँ जिसे पढ़कर आपकी आँखें नम हो जाएंगी। यह कहानी किसी युद्ध की नहीं, एक 14 साल के बच्चे की है।
"साहब! मुझे ज़हर दे दो, पर कोड़े मत मारो..."एक 14 साल के बच्चे की वो चीख, जो इतिहास ने दफन कर दी।
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक 8वीं क्लास में पढ़ने वाले बच्चे को सरेआम नंगा किया जाए और उसके कोमल शरीर पर तब तक कोड़े बरसाए जाएं जब तक कि उसकी खाल उधड़कर ज़मीन पर न गिर जाए?
यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, वाराणसी के उस गुमनाम बालक की है जिसका नाम सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी।
साल 1921, 'असहयोग आंदोलन' की आग पूरे देश में थी। काशी (वाराणसी) की गलियों में एक 14 साल का बच्चा हाथ में तिरंगा लिए अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगा रहा था। पुलिस ने उसे पकड़ लिया और कचहरी में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।
अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने रौब से पूछा— "तुम्हारा नाम क्या है?"
उस बच्चे ने सीना तानकर कहा— "आज़ाद!"
मजिस्ट्रेट को गुस्सा आया, उसने फिर पूछा— "तुम्हारे बाप का नाम क्या है?"
बच्चे की आवाज़ और बुलंद हुई— "स्वतंत्रता!"
मजिस्ट्रेट चिल्लाया— "तुम्हारा घर कहाँ है?"
बच्चे ने मुस्कुराकर जवाब दिया— "जेलखाना!"
वो सज़ा, जिसे सुनकर दरिंदे भी छुप गए
उस मजिस्ट्रेट ने एक 14 साल के बच्चे को ऐसी खौफनाक सज़ा सुनाई जो इंसानियत के नाम पर कलंक थी। उसने आदेश दिया— "इस लड़के को नंगा करके टिकटी से बांध दो और इसे 15 बेंत (कोड़े) मारो।"
उस बच्चे को सबके सामने निर्वस्त्र किया गया। भारी और मोटे बेंत से जब पहला प्रहार उसकी पीठ पर हुआ, तो खाल उधड़ गई और खून का फव्वारा छूट पड़ा।
हर कोड़े के साथ उस बच्चे की चीख निकलती थी, लेकिन वो चीख दर्द की नहीं थी। हर कोड़े पर वह लड़का पूरी ताकत से चिल्लाता था— "वंदे मातरम!"...
"हड्डियाँ दिखने लगीं, पर आवाज़ नहीं रुकी"
5 कोड़े... 10 कोड़े... 12 कोड़े... उस बच्चे की पीठ का मांस फटकर लटक गया था। वह बार-बार बेहोश हो रहा था, लेकिन जैसे ही होश आता, उसके खून से लथपथ होंठों से फिर निकलता— "वंदे मातरम!"
मजिस्ट्रेट खड़ा देख रहा था कि कब यह बच्चा रहम की भीख मांगेगा, कब यह रोएगा। लेकिन उस 14 साल के बच्चे ने अपनी आंखों में इतना गर्व भर रखा था कि अंग्रेज जलकर राख हो गए।
जब 15 कोड़े पूरे हुए, तो उस बच्चे का शरीर मांस का एक लोथड़ा बन चुका था। जेल के डॉक्टर ने जब घावों पर नमक और दवा लगाई, तो वह बच्चा दर्द से तड़प उठा, लेकिन उसने एक आंसू तक नहीं गिराया।
हम उसे भूल गए...
बाद में उसी 14 साल के बच्चे को दुनिया ने 'चंद्रशेखर आज़ाद' के नाम से जाना। लोग उनकी मूँछों वाली फोटो तो लगाते हैं, लेकिन उस 14 साल के बच्चे की वो नंगी पीठ और बहता हुआ खून भूल गए जिसने आज़ादी की नींव रखी थी।
आज हम अपनी छोटी सी चोट पर रोने लगते हैं। जरा सोचिए उस बच्चे के बारे में, जिसने हमारे लिए अपनी कच्ची उम्र में कोड़े खाए थे।
अगर आप इस कहानी को पढ़कर भी चुप रह गए, तो समझ लेना कि हम वाकई एक एहसान-फरामोश कौम बन चुके हैं।
इस पोस्ट को शेयर करके दुनिया को बताओ कि 'आज़ाद' सिर्फ एक नाम नहीं था, वह एक 14 साल के बच्चे के खून से लिखा गया 'इतिहास' था।
कमेंट में अपने शहर का नाम जरूर लिखें ताकि हमें पता चले हमारी पोस्ट कहां कहां पहुंच रहीं है।धन्यवाद