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जब मीडिया सवाल नहीं पूछता… सिर्फ विपक्ष पर चिल्लाता है!”



यह विश्व इतिहास का एक अद्भुत और सर्वथा मौलिक प्रयोग है, जहाँ घर का कुत्ता चोर को नहीं काटता, बल्कि उस पड़ोसी पर भौंकता है जो जागकर शोर मचाने की कोशिश कर रहा है। विपक्ष बेचारा दिन भर सड़क पर धूल फांककर, पुलिस के धक्के खाकर जब शाम को अपनी थकान मिटाने के लिए टीवी खोलता है, तो पाता है कि टेलीविजन के परदे से निकलकर एक सूट-बूट वाला एंकर उसे ही 'राष्ट्र-निर्माण', 'सकारात्मक राजनीति' और 'सभ्य आचरण' का पाठ पढ़ा रहा है।

पुराने, पिछड़े और 'आउटडेटेड' युग में एक घिसा-पिटा नियम था कि पत्रकार सरकार से सवाल पूछता था। मसलन- "अर्थव्यवस्था क्यों गिर रही है?" लेकिन आज का आधुनिक, हाई-डेफिनिशन पत्रकार विपक्ष का कॉलर पकड़कर, उसे कठघरे में खड़ा करके गुर्राता है- "जब अर्थव्यवस्था गिर रही थी, तो तुम ठीक से धरना क्यों नहीं दे पाए? तुम्हारे धरने में वह 'विजन' और 'गहराई' क्यों नहीं थी?" इन ज्ञानियों की नजर में सत्ता तो एक मासूम, अबोध बच्चा है, जिसे विपक्ष अपनी 'नकारात्मक राजनीति' से बेवजह डरा रहा है।

रात के आठ बजते ही स्टूडियो में राष्ट्रवाद और ज्ञान की जो गंगा बहती है, वह सीधे विपक्ष के आंगन में जाकर कीचड़ कर देती है। एक एंकर, जो खुद रीढ़ की हड्डी के बजाय सत्ता के 'रिमोट कंट्रोल' के सहारे सीधा बैठा है, वह टीवी पर गला फाड़कर विपक्ष से 'मजबूत स्टैंड' लेने की मांग करता है। दरअसल, यह रोज रात प्राइम टाइम पर होने वाली 'खबरों की हत्या' का सीधा प्रसारण (Live Telecast) है। इस हत्या को बहुत ही शालीनता से 'डिबेट' का नाम दिया गया है।

इस डिबेट का नियम बहुत सरल और पारदर्शी है: एक विपक्षी प्रवक्ता को चार सरकारी प्रवक्ताओं और एक 'तटस्थ' (यानी सरकार से भी चार कदम आगे चलने वाले) विश्लेषक के बीच ऐसे छोड़ दिया जाता है, जैसे रोम के कोलोसियम में किसी निहत्थे को भूखे शेरों के बाड़े में। फिर एंकर रेफरी बनकर सीटी बजाता है और चीखता है- "बताइए, देश की हर समस्या के लिए आपके परदादा जिम्मेदार क्यों हैं?"

अगर देश में कोई बड़ा संकट आ जाए, तो मीडिया सरकार से यह नहीं पूछता कि जहाज क्यों डूब रहा है। वह विपक्ष के नेता की तरफ माइक तान कर पूछता है- "आप तो कहते थे कि जहाज डूब जाएगा, देखिए, आपकी मनहूस जुबान की वजह से डूबने लगा! आपको अपनी इस नकारात्मक सोच के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए।"

मीडिया ने बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से यह विश्लेषण कर लिया है कि सत्ता से उसकी जवाबदेही पूछना एक बहुत थकाऊ, गैर-जरूरी और जोखिम भरा काम है। इसमें सरकारी विज्ञापन रुकने और जांच एजेंसियों के अचानक जाग जाने का खतरा रहता है। इसके बजाय, जो सत्ता से बाहर है, जिसके पास कोई पावर नहीं है, उस पर चीखना सबसे सुरक्षित और फायदेमंद 'वीरता' है।

आज का मीडिया अब सूचना का माध्यम नहीं रहा, यह एक 'सुधार गृह' (Correctional Facility) बन गया है, जिसका इकलौता जीवन-आजीवन कैदी विपक्ष है। जिस दिन विपक्ष यह समझ जाएगा कि इस देश में सरकार से ज्यादा मीडिया को सत्ता का नशा हो गया है, उस दिन शायद यह ज्ञान बांटने वाली दुकानें बंद हों और असली सवालों की वापसी हो। फिलहाल तो विपक्ष को चाहिए कि वह शांति से बैठकर डायरी में एंकरों के 'सुवचन' नोट करे, क्योंकि ज्ञान मुफ्त में बंट रहा है और टीवी एंकर की वैचारिक गहराई की कोई थाह नहीं है।

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