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"शेरघाटी की जनता का हिसाब" 'जीरो' से 'हीरो' और फिर वही सफर?

"शेरघाटी की जनता का हिसाब"

'जीरो' से 'हीरो' और फिर वही सफर?

​संपादकीय,
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

​शेरघाटी की राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहाँ की मिट्टी ने सामान्य कार्यकर्ताओं को पलकों पर बिठाकर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाया है। वार्ड सदस्य से विधायक बनीं मंजू अग्रवाल हों या वार्ड समिति से बिहार के पंचायती राज मंत्री तक का सफर तय करने वाले विनोद यादव—जनता ने सबको 'हीरो' बनने का भरपूर मौका दिया।
लेकिन विडंबना देखिए, जैसे ही सत्ता हाथ में आई, जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली में गिरावट का दौर शुरू हो गया।
नतीजा?
जनता ने उन्हें फिर से 'हीरो' से 'जीरो' पर ला खड़ा किया।

​वर्तमान विधायक से सीधे कुछ सवाल:

.जिला बनाने का रोडमैप क्या है?:
दशकों पुरानी 'शेरघाटी जिला बनाओ' की मांग आज भी फाइलों में क्यों दबी है?
क्या इस कार्यकाल में इसके लिए कोई ठोस विधायी प्रयास होगा?

​शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल:

शेरघाटी अनुमंडलीय अस्पताल और स्थानीय कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं और डॉक्टरों/शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?

​जाम और अतिक्रमण की समस्या:
शेरघाटी बाजार में हर दिन लगने वाले भीषण जाम और मुख्य सड़कों पर बढ़ते अतिक्रमण से जनता को कब निजात मिलेगी?

​अनुपलब्धता का आरोप:
चुनाव जीतने के बाद विधायक और जनता के बीच की दूरी क्यों बढ़ जाती है? क्या आम आदमी अपनी समस्याओं के लिए आप तक आसानी से पहुँच पा रहा है?
​भ्रष्टाचार पर लगाम:
प्रखंड और अंचल कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार और 'बिचौलिया संस्कृति' को खत्म करने के लिए आपकी क्या योजना है?

​स्थानीय मुद्दे जो आज भी 'स्वर्ग' बनने की राह में रोड़ा हैं:

​पेयजल संकट: गर्मी आते ही शेरघाटी के कई वार्डों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है।

​लचर सफाई व्यवस्था:
शहर की नालियों और कूड़ा प्रबंधन की स्थिति आज भी नारकीय बनी हुई है।

​युवाओं का पलायन:
रोजगार के अवसरों की कमी के कारण शेरघाटी का हुनर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने को मजबूर है।

​निष्कर्ष:
समय का चक्र बहुत बलवान होता है। शेरघाटी की जनता अब सिर्फ 'वादों के स्वर्ग' से संतुष्ट नहीं होने वाली। उसे धरातल पर बदलाव चाहिए।

अगर वर्तमान नेतृत्व ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया और शेरघाटी को जिला बनाने जैसे बड़े लक्ष्यों पर काम नहीं किया, तो 'समय का पहिया' उन्हें भी वही परिणाम दिखा सकता है जो पूर्ववर्तियों ने झेला है।

​"शेरघाटी को जिला बनाओ, वरना अपनी कुर्सी बचाओ!"
​"वोट हमारा, राज तुम्हारा—अब नहीं चलेगा यह नारा!"
​"काम बोलता है, वरना जनता का डंडा बोलता है।"

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