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माप पुस्तिका में हेरफेर, पाइपलाइन में घोटाला – परसदा योजना जांच के घेरे में! भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुंचेगा मामला? नल-जल योजना बना घोटाले का अड्डा!

जनता के हक का पानी पीएचई के अधिकारी और कार्य एजेंसी की जेब में!

सारंगढ़-बिलाईगढ़ : - ग्राम पंचायत परसदा (बड़े), उपखण्ड सारंगढ़ में जल जीवन मिशन अंतर्गत स्वीकृत नल-जल प्रदाय योजना अब गंभीर तकनीकी एवं वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के कारण प्रशासनिक जांच के दायरे में आ गई है। लगभग 1 करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृत लागत से निष्पादित इस परियोजना में कार्यपालन एजेंसी एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हुए हैं, जहां आरोप है कि परियोजना को निर्धारित तकनीकी मानकों एवं अनुबंध शर्तों के अनुरूप पूर्ण किए बिना ही कागजों में “कार्य पूर्ण” दर्शाकर लगभग 90 प्रतिशत भुगतान आहरित कर लिया गया। प्राप्त तथ्यों एवं अभिलेखों के अनुसार योजना के अंतर्गत प्रत्येक कार्य की प्रविष्टि माप पुस्तिका में वास्तविक स्थल निरीक्षण एवं भौतिक सत्यापन के आधार पर दर्ज किया जाना अनिवार्य था जिसके पश्चात ही वित्तीय स्वीकृति एवं भुगतान की प्रक्रिया पूर्ण की जानी थी साथ ही संपूर्ण वितरण प्रणाली पाइपलाइन एवं घरेलू कनेक्शन को कार्यशील स्थिति में स्थापित कर ग्राम पंचायत को विधिवत तकनीकी परीक्षण उपरांत हस्तांतरण किया जाना था। किन्तु आरोप है कि उक्त प्रक्रिया का घोर उल्लंघन करते हुए परियोजना को लगभग दो वर्ष पूर्व ही कागजों में पूर्ण दर्शाकर हैंडओवर कर दिया गया जबकि वर्तमान में भी योजना का संचालन सुनिश्चित नहीं हो सका है उपभोक्ताओं तक आज भी जल आपूर्ति बाधित है।
           सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के विश्लेषण में यह भी आरोप उभरकर सामने आया है कि माप पुस्तिका में प्रविष्ट कार्य एवं स्थल पर निष्पादित कार्य में स्पष्ट असंगति है। गाँव में लगभग 350 प्लेटफॉर्म (चबूतरा) निर्माण दर्शाया गया है किन्तु बड़ी संख्या में इनका साइज स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप नहीं पाया गया। इसके बावजूद अभिलेखों में मानकानुसार कार्य निष्पादन दर्शाते हुए पूर्ण भुगतान किया जाना गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर इसारा करता है। इसी प्रकार जल वितरण हेतु प्रयुक्त कम्पोजिट पाइपलाइन के संबंध में आरोप है कि इसे निर्धारित गहराई  एवं तकनीकी विनिर्देशों के अनुरूप स्थापित नहीं किया गया। यह भी आरोप है की वास्तविक पाइपलाइन लंबाई की तुलना में 3 से 5 मीटर अधिक लंबाई अभिलेखों में दर्शाकर अतिरिक्त राशि आहरित किए जाने की बात भी सामने आई है जो कि स्पष्ट रूप से माप एवं लेखांकन में हेरफेर और दस्तावेजो मे कूट रचना की ओर संकेत करता है।
              प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू जांच प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है जहां शिकायत के उपरांत स्वतंत्र एवं निष्पक्ष एजेंसी से तकनीकी जांच कराए जाने के स्थान पर उसी विभागीय तंत्र से जांच संपन्न कराई गई जिस पर स्वयं आरोप लगाए गए हैं। ऐसी स्थिति में जांच की पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। शिकायतकर्ता द्वारा पुनः सक्षम प्राधिकारी (कलेक्टर) के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत कर स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट एवं वित्तीय अनियमितताओं की विस्तृत जांच की मांग की गई है साथ ही यह भी अवगत कराया गया है कि यदि नियमानुसार कार्रवाई नहीं की जाती है तो प्रकरण को न्यायिक मंच विशेषतः माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
               उक्त प्रकरण अब केवल एक स्थानीय निर्माण कार्य की अनियमितता तक सीमित न रहकर शासन की महत्वाकांक्षी जल प्रदाय योजना के क्रियान्वयन में संभावित प्रणालीगत त्रुटियों, प्रशासनिक उदासीनता एवं वित्तीय अनुशासनहीनता का संकेतक बन गया है। ऐसी स्थिति में यदि त्वरित, निष्पक्ष एवं कठोर प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की जाती है तो यह न केवल सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का मामला सिद्ध हो सकता है बल्कि शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। और शासन की छबि ख़राब कर सकता है।

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