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तुलना का जाल

मनुष्य जब स्वयं को पहचानना भूल जाता है, तब वह दूसरों से अपनी तुलना करने लगता है। तुलना पहली नज़र में प्रेरणा जैसी लगती है, पर धीरे-धीरे यह एक जाल बन जाती है, जिसमें फँसकर व्यक्ति अपना संतोष, आत्मविश्वास और मौलिकता खो देता है। जीवन में दुख का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम अपनी यात्रा की तुलना दूसरों की मंज़िल से करने लगते हैं। यह तुलना हमें आगे नहीं बढ़ाती, बल्कि भीतर से कमजोर कर देती है।

अक्सर हम दूसरों के जीवन का केवल चमकता हुआ हिस्सा देखते हैं—उनकी सफलता, उनका सम्मान, उनका सुख—पर उनके संघर्ष, असफलताएँ और भय हमें दिखाई नहीं देते। जब हम अधूरी जानकारी के आधार पर तुलना करते हैं, तो निष्कर्ष भी गलत निकलता है। हम स्वयं को कमतर समझने लगते हैं और धीरे-धीरे यह भावना हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाती है।

एक जंगल में एक मोर अपने सुंदर पंखों पर गर्व करता था। वह रोज़ अपनी सुंदरता देखकर प्रसन्न होता। एक दिन उसने एक कौए को उड़ते देखा और सोचा—“मैं इतना सुंदर होकर भी इतनी ऊँचाई तक नहीं उड़ पाता।” कौआ मोर के पंख देखकर सोचता—“मैं इतना साधारण हूँ, मेरे पास मोर जैसे पंख नहीं हैं।” दोनों अपनी-अपनी कमी देखकर दुखी रहने लगे। एक दिन एक वृद्ध पक्षी ने उनसे कहा—“प्रकृति ने किसी को भी अधूरा नहीं बनाया। मोर की सुंदरता उसकी पहचान है और कौए की उड़ान उसकी शक्ति।” उस दिन दोनों ने समझा कि तुलना ने उन्हें अपनी वास्तविक शक्ति से दूर कर दिया था।

यह दृष्टांत हमें सिखाता है कि तुलना हमें हमारी विशेषताओं से काट देती है। हर व्यक्ति की क्षमता, गति और परिस्थिति अलग होती है। जब हम स्वयं को किसी और के मानदंड से मापते हैं, तब हम अपनी पहचान खो बैठते हैं। तुलना हमें या तो अहंकार में डालती है या हीनभावना में—और दोनों ही स्थितियाँ विकास में बाधा हैं।

तुलना का एक और दुष्परिणाम यह है कि हम वर्तमान का आनंद खो देते हैं। हम सोचते रहते हैं—“अगर मेरे पास भी यह होता”, “मैं भी वहाँ होता”, और इस सोच में जो हमारे पास है, उसकी कद्र करना भूल जाते हैं। तुलना हमें निरंतर अधूरापन महसूस कराती है, जबकि कृतज्ञता हमें पूर्णता का अनुभव कराती है।

यह भी समझना आवश्यक है कि दूसरों से सीखना और तुलना करना अलग बातें हैं। सीखना हमें प्रेरित करता है, तुलना हमें थका देती है। जब हम किसी की सफलता देखकर यह पूछते हैं—“मैं इससे क्या सीख सकता हूँ?” तब हम आगे बढ़ते हैं। और जब हम पूछते हैं—“मेरे पास यह क्यों नहीं है?” तब हम भीतर से टूटने लगते हैं।

चतरसिंह गेहलोत
शिक्षक। साहित्यकार। सामाजिक कार्यकर्ता
9993803698

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