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लोकतंत्र की आवाज़ या सन्नाटे की साज़िश? - UNI दफ्तर की सीलिंग का सच

नई दिल्ली का रफ़ी मार्ग। यहाँ की हवाओं में आज भी खबरों की गंध और चाय की चुस्कियों के बीच होने वाली बड़ी चर्चाओं की गूँज है। यहीं खड़ा है United News of India (UNI) का 55 साल पुराना दफ्तर। वो दफ्तर, जिसने आज़ाद भारत की पत्रकारिता को गढ़ा, जहाँ संसद की सरगर्मी और आम आदमी की आवाज़ को स्याही मिली। 1960 के दशक में जब भारत सरकार ने यह ज़मीन दी थी, तब मकसद था—स्वतंत्र पत्रकारिता की मशाल को जलाए रखना।
लेकिन आज, तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयाँ कर रही हैं। सरकार का तर्क है कि नियमों का उल्लंघन हुआ, ज़मीन का उपयोग बदला गया और आवंटन रद्द कर दिया गया। कानून अपना काम करे, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन क्या कानून के हाथ में 'दमन' का हथियार होना ज़रूरी है?
कल जब दिल्ली पुलिस ने इस परिसर को सील किया, तो मंजर किसी न्यूज़ एजेंसी के दफ्तर का नहीं, बल्कि किसी दुश्मन के ठिकाने जैसा लग रहा था। भारी पुलिस बल, अफरा-तफरी, और पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार।
सवाल ज़मीन की सीलिंग का नहीं है, सवाल 'तरीके' का है:
* क्या पत्रकार अपराधी थे?: क्या इस न्यूज़ एजेंसी के भीतर कोई असामाजिक तत्व छिपे थे, जिन्हें पकड़ने के लिए किसी एनकाउंटर जैसी घेराबंदी की ज़रूरत पड़ी?
* संवाद की कमी क्यों?: क्या दिल्ली पुलिस में कोई ऐसा अधिकारी नहीं था जो गरिमा के साथ, कानून का हवाला देकर न्यूज़ एजेंसी के प्रबंधन से बात करता और सम्मानजनक तरीके से प्रक्रिया पूरी करता?
* विपक्ष की आवाज़ और डर: आज सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि जो 'हाँ में हाँ' मिलाए वो राष्ट्रवादी, और जो सवाल पूछे वो 'शत्रु'। क्या इस तरह की सैन्य-शैली की कार्रवाई इन आरोपों को और पुष्ट नहीं करती?
निष्कर्ष: लोकतंत्र की गरिमा पर चोट
जब हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव मनाते हैं, तो 'आज़ाद पत्रकारिता' उसका सबसे बड़ा स्तंभ होती है। लेकिन जब किसी प्रतिष्ठित संस्थान को खाली कराने के लिए 'एनकाउंटर' जैसा माहौल बनाया जाता है, तो चोट सिर्फ एक इमारत पर नहीं, बल्कि उस भरोसे पर लगती है जो एक आम आदमी अपनी व्यवस्था पर करता है।
अदालती आदेशों का पालन ज़रूर हो, लेकिन क्या लोकतंत्र में 'सम्मान' की कोई जगह शेष नहीं रही?

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