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लखनऊ का 'पार्थ अर्का' घोटाला: 10 साल, सैकड़ों बर्बाद परिवार और बिल्डर की वो 'तिजोरी' जिसमें दफन हैं आपके करोड़ों रुपए!

लखनऊ | [21/03/2026] रिपोर्ट: स्पेशल इंवेस्टिगेशन डेस्क
गोमती नगर विस्तार की चकाचौंध के बीच एक ऐसी 'कब्रगाह' खड़ी है, जहाँ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि लखनऊ के सैकड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के सपने दफन हैं। नाम है 'पार्थ अर्का' (Parth Arka)। जिसे कभी 'आलीशान जीवन' का गेटवे बताया गया था, वह आज उत्तर प्रदेश के रियल एस्टेट इतिहास में 'विश्वासघात' का सबसे बड़ा स्मारक बन चुका है।

1. सपनों की 'किस्त' और किराए की 'फांसी'
पिछले एक दशक से इस परियोजना के आवंटी 'दोहरी आर्थिक गुलामी' काट रहे हैं। एक तरफ बैंकों की बेरहम EMI है जो हर महीने खाते से कट जाती है, और दूसरी तरफ सिर छिपाने के लिए दिया जाने वाला भारी-भरकम किराया। एक आवंटी ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा, "हम मकान के लिए नहीं, बल्कि बिल्डर की अय्याशी और सिस्टम की सुस्ती की सजा भुगत रहे हैं।"

2. कहाँ गया जनता का पैसा? फॉरेंसिक ऑडिट की उठी मांग
बिल्डर की नीयत पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 'लखनऊ पार्थ अर्का आवंटी एवं रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन' ने मोर्चा खोलते हुए UPRERA (यूपी रेरा) में धारा 8 के तहत सामूहिक केस ठोक दिया है।

बड़ी मांग: आवंटियों ने धारा 35 के तहत प्रोजेक्ट के 'फॉरेंसिक ऑडिट' की मांग की है। आरोप है कि जनता की गाढ़ी कमाई को 'साइफनिंग' (Siphoning of funds) के जरिए दूसरे प्रोजेक्ट्स या निजी हितों में डाइवर्ट कर दिया गया है।

3. मुख्यमंत्री का 'आश्वासन' बनाम अफसरों की 'सुस्ती'
हताश आवंटियों ने मुख्यमंत्री के 'जनता दर्शन' में अपनी फरियाद लगाई थी। सूबे के मुखिया ने त्वरित कार्रवाई और दोषियों को न बख्शने का भरोसा भी दिया, लेकिन जमीनी हकीकत ढाक के तीन पात है। सचिवालय की फाइलों में न्याय की रफ़्तार 'कछुए' से भी धीमी है, जिससे बिल्डर के हौसले बुलंद हैं।

4. प्रशासनिक तंत्र की विफलता या मिलीभगत?
रेरा के आदेशों को रद्दी का टुकड़ा समझने वाले बिल्डर पर अब तक कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई न होना, प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। आवंटियों का सीधा सवाल है "क्या सरकार के पास इन 'सफेदपोश' बिल्डरों पर नकेल कसने की शक्ति खत्म हो गई है?"

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