विषय: बढ़ती हुई सरकारी निर्भरता – क्या यह मानव समाज के लिए उचित है?
आज के आधुनिक युग में मनुष्य ने विज्ञान, तकनीक और सुविधाओं में अद्भुत प्रगति की है। बिजली, गैस, सड़क, संचार और विभिन्न सरकारी व्यवस्थाएँ हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। परंतु एक गंभीर प्रश्न यह भी उठता है कि क्या इन सुविधाओं ने मनुष्य को अधिक स्वतंत्र बनाया है या उसे सरकार पर अत्यधिक निर्भर बना दिया है?
यदि हम पुराने समय की ओर देखें तो पाएँगे कि मनुष्य बहुत कम साधनों के साथ भी संतुष्ट और प्रसन्न जीवन जीता था। गाँवों में लोग बिना गैस सिलेंडर के चूल्हे पर भोजन बनाते थे, बिना बिजली के भी जीवन चलता था, कच्ची सड़कों के बावजूद लोग अपने कार्य कर लेते थे। समाज का संचालन आपसी सहयोग, नैतिकता और परंपराओं के आधार पर होता था। उस समय जीवन सरल था और मनुष्य प्रकृति के अधिक निकट था।
समय के साथ सरकारें बनीं और उन्होंने व्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए अनेक नियम और सुविधाएँ प्रदान कीं। बिजली आई, गैस आई, पानी की सप्लाई आई, सड़कें बनीं और जीवन अधिक सुविधाजनक हो गया। लेकिन इन सुविधाओं के साथ कर (टैक्स) की व्यवस्था भी आई। आज लगभग हर सुविधा पर किसी न किसी रूप में कर देना पड़ता है। इस प्रकार धीरे-धीरे मनुष्य अपनी पारंपरिक आत्मनिर्भर जीवनशैली से दूर होता गया और सरकारी व्यवस्थाओं पर निर्भर होता चला गया।
यदि मनुष्य हर छोटी-बड़ी आवश्यकता के लिए केवल सरकार पर निर्भर हो जाएगा, तो उसकी स्वाभाविक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता कमजोर पड़ जाएगी। सरकार का कार्य व्यवस्था देना है, लेकिन समाज की शक्ति उसके आत्मनिर्भर नागरिकों में होती है।
इसलिए आवश्यक है कि आधुनिक सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी मनुष्य अपनी पारंपरिक बुद्धि, आत्मनिर्भरता और संतुलित जीवनशैली को न भूले। विज्ञान और व्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य को सशक्त बनाना होना चाहिए, न कि उसे पूर्णतः निर्भर बनाना।
अंततः यही कहा जा सकता है कि प्रगति तभी सार्थक है जब वह मनुष्य की स्वतंत्रता, संतुलन और प्रकृति के साथ सामंजस्य को बनाए रखे। यदि आविष्कार और व्यवस्थाएँ मनुष्य को उसकी मूल स्वतंत्रता से दूर कर दें, तो यह प्रगति नहीं बल्कि एक नई प्रकार की निर्भरता बन जाती है।
~डॉ. आनंद मिश्रा
(Jaunpur-bhadohi UP)