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पतंग और धागे की सच्चाई

पतंग और धागे की सच्चाई


नीले आसमान में एक रंग-बिरंगी पतंग बड़ी शान से उड़ रही थी। हवा उसे ऊपर उठाती जा रही थी, और नीचे खड़ा एक बच्चा उसे प्यार से संभाले हुए था। पतंग को लग रहा था कि वो आसमान की रानी है।
कुछ देर बाद पतंग ने नीचे बंधे धागे से कहा—
“तुम हमेशा मुझे रोके रखते हो। मैं और ऊँचा उड़ना चाहती हूँ, खुलकर उड़ना चाहती हूँ… लेकिन तुम मुझे आज़ादी ही नहीं देते!”
धागा मुस्कुराया और बोला—
“मैं तुम्हें रोकता नहीं, संभालता हूँ। तुम्हारी ऊँचाई का कारण भी मैं ही हूँ।”
पतंग नाराज़ हो गई—
“नहीं! तुम ही मेरी उड़ान की सबसे बड़ी रुकावट हो। अगर तुम नहीं होते, तो मैं आसमान के पार चली जाती!”
धागे ने कुछ पल सोचा… फिर बोला—
“ठीक है, अगर तुम्हें आज़ादी ही चाहिए… तो आज मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ।”
इतना कहते ही धागा ढीला पड़ा… और अचानक टूट गया।
पतंग खुशी से झूम उठी—
“अब मैं आज़ाद हूँ!”
वो तेज़ हवा के साथ इधर-उधर उड़ने लगी… पहले से भी ऊँची गई… लेकिन अब कोई दिशा नहीं थी, कोई नियंत्रण नहीं था।
कुछ ही पलों में हवा ने अपना रुख बदला… पतंग डगमगाई… और फिर तेजी से नीचे गिरने लगी।
धड़ाम!
वो ज़मीन पर आ गिरी।
लोगों ने उसे उठाया… कोई उसे खींचने लगा, कोई पैरों से घसीटने लगा…
कुछ ही देर में वो सुंदर पतंग फटकर बेकार कागज़ बन गई।
गिरते-गिरते पतंग को धागे की बात याद आई—
“मैं तुम्हें रोकता नहीं… संभालता हूँ…”
अब उसे समझ आ चुका था कि असली आज़ादी, बिना सहारे के नहीं होती…
कुछ बंधन ऐसे होते हैं, जो हमें गिरने से बचाते हैं।
सीख:
हर रोकने वाला दुश्मन नहीं होता…
कुछ रिश्ते और नियम हमें टूटने से बचाते हैं।
अगर कहानी ने दिल को छुआ हो, तो बताइए—क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा “धागा” है, जिसे आप पहले गलत समझते थे?

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