बिहार के मेधावी 'हनुमान': सफलता का आसमान और सामाजिक बेड़ियाँ ।
"सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,
सभी है भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो"
-दुष्यन्त कुमार
हाल ही में घोषित संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के परिणामों ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि बिहार की मिट्टी में संघर्ष को सफलता में बदलने का एक अद्भुत रसायन है। मुजफ्फरपुर के "राघव झुनझुनवाला (AIR 4)" से लेकर "उज्ज्वल प्रियांक (AIR 10)" और "मोनिका श्रीवास्तव (AIR 16)" तक, इन युवाओं ने दिखाया है कि संसाधन भले ही कम हों, लेकिन यदि संकल्प दृढ़ हो, तो दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक का रास्ता सुगम हो जाता है। विशेष रूप से "रवि राज (AIR 20)" जैसे दृष्टिबाधित योद्धा और समस्तीपुर के एक साधारण किराना दुकानदार के बेटे "आयुष कुमार (AIR 143)" की सफलता यह बताती है कि बिहार का युवा 'पवनपुत्र' की तरह है, जिसे अपनी शक्ति का आभास होते ही वह असंभव को संभव कर देता है।
सफलता के पीछे का अदृश्य आधार भावनात्मक संबल होना भी होता है ।
अक्सर हम केवल सफल उम्मीदवार की फोटो देखते हैं, लेकिन इस बार का परिणाम उन अभिभावकों की जीत है जिन्होंने 'पैसे' से ज्यादा 'भरोसा' निवेश किया। हिंदुस्तान की इस कठिनतम परीक्षा में जब बच्चा टूटता है, तब परिवार का "इमोशनल सपोर्ट" ही वह ढाल बनती है जो उसे हारने नहीं देती। यह साबित हो गया है कि महँगे संस्थान और बड़ी फीस से कहीं अधिक मूल्यवान वह माँ की दुआ और पिता का अटूट विश्वास है, जो छात्र को अंधेरी रातों में भी पढ़ने का हौसला देता है।
आज बिहार की आधी आबादी का पूरा दबदबा बिहार में एक नया सामाजिक बदलाव दिख रहा है। लड़कों की तुलना में लड़कियों में सरकारी नौकरी की ललक और सफलता की दर तेजी से बढ़ी है। राज्य सरकार की आरक्षण नीति और सुरक्षा के माहौल ने उन्हें वह पंख दिए हैं, जिससे अब वे रुकने वाली नहीं हैं। बिहार पुलिस से लेकर शिक्षा विभाग तक, हर जगह 'बिहार की बेटियां' अपनी मेधा का लोहा मनवा रही हैं। यह केवल नौकरी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी बेड़ियों को तोड़कर आसमान छूने की उड़ान है।
अब विडंबना ये है कि "नौकरी देने वाला" बनने के बजाय 'नौकरी पाने' की होड़ क्यों?
मेरे लिखने का सबसे गंभीर और मर्मस्पर्शी पहलू यह है कि हमारे युवा अथाह ऊर्जा से लबरेज हैं फिर भी सरकारी नौकरी ही क्यों ?
जब बिहार का युवा इतना बुद्धिमान है कि वह देश की सबसे कठिन परीक्षा निकाल सकता है, तो वह उद्यमिता (Entrepreneurship) या नवाचार की ओर क्यों नहीं बढ़ता? इसके पीछे गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं जो हमे समझना पड़ेगा ।
हमारे समाज में आज भी एक प्राइवेट सेक्टर के बड़े मैनेजर की तुलना में एक सरकारी क्लर्क को अधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यह "सामाजिक रसूख" की भूख युवाओं को रिस्क लेने से रोकती है।
दूसरा की अभावों से उपजा डर व्यक्ति को 'स्थायित्व' (Stability) की ओर धकेलता है। व्यापार में डूबने का खतरा है, जबकि सरकारी नौकरी में "निश्चितता" है। इसी निश्चितता के पीछे बिहार की सबसे मेधावी नस्ल अपनी रचनात्मकता को दांव पर लगा देती है।
तीसरा सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि सरकारी नौकरी की ललक में बिहार के युवाओं की आधी उम्र किताबों और पुस्तकालयों में बीत जाती है। आँखों पर मोटे चश्मे चढ़ जाते हैं, शरीर थक जाता है, और यदि परिणाम पक्ष में न आए, तो समाज उन्हें "अपराधी" की तरह देखने लगता है। यह 'गिल्ट' (आत्मग्लानि) एक युवा की मानसिक और शारीरिक ऊर्जा को भीतर से खोखला कर देती है।
अब सोच बदलने की जरूरत है
यह सवाल हम सभी के सामने खड़ा है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सिर्फ 'नौकर' (चाहे वह सरकारी ही क्यों न हो) बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं?
यदि बिहार का युवा अपनी वही ऊर्जा स्टार्टअप, कृषि-नवाचार या तकनीकी शोध में लगाए, तो बिहार 'नौकरी मांगने वाला' नहीं, 'नौकरी देने वाला' प्रदेश बन सकता है।
समाज को भी अपनी संकीर्ण सोच बदलनी होगी। असफलता पर तानों के बजाय मानसिक समर्थन देना होगा। बिहार के इन "हनुमानों" को अब यह याद दिलाने की जरूरत है कि उनका साम्राज्य केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा विश्व उनके विचारों और साहस की प्रतीक्षा कर रहा है।
"बिहार का युवा अब केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने और नया इतिहास रचने के लिए पहचाना जाना चाहिए। क्योंकि जिस मिट्टी में राघव और आयुष पैदा हो सकते हैं, वहां 'टाटा' और 'अंबानी' भी पैदा हो सकते हैं। जरूरत है तो बस उस नजरिए की।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT