चैत्र नवरात्र महूर्त , पूजन, व ज्योतिषीय गणना - सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्या आशा त्यागी
मेरठ - सुप्रसिद्ध ज्योतिशाचार्या व आइआइएमटी विश्वविद्यालय में ज्योतिष शिक्षा विभाग की प्रभारी आशा त्यागी की ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार चैत्र नवरात्र पर विशेष प्रस्तुति -
चैत्रनवरात्रि गुड़ीपड़वा(19 मार्च गुरुवार से --27 मार्च 2026)
👉🍁कलियुग संवत -- 5128 में प्रवेश होगा
विक्रम संवत-- 2083 प्रारम्भ तथा नाम: --रौद्र संवत्सर
🍁नवरात्र पूजा विधि एवं कलश स्थापना।
🍁नवरात्रि में माता के ज्वारे बोने की विधि 🍁
मां जगदम्बा हम सभी पर अपनी अपने कृपा बनाए रखे।🙏
जयश्री गणेश ,यह वसंत नवरात्रि है, जहाँ माँ दुर्गा के नौ दिव्य रूपों की आराधना से घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
विसर्जन: ज्वारे/कलश का विसर्जन आमतौर पर नवमी या कहीं दशमी को भी होता है।नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है।प्रत्येक दिन एक देवी का पूजन किया जाता है, और हर देवी के स्वरूप में अलग-अलग प्रकार की शक्ति और आशीर्वाद समाहित होते हैं।
👉🍁इस बार नवरात्रि पूरे 9 दिन की होगी
( ज्वारे विसर्जन नवम दिन 27 मार्च को ही होगा )
दिन तिथि वार देवी पूजा
🍁प्रतिपदा – 19 मार्च 2026 (गुरुवार) – माँ शैलपुत्री
🍁द्वितीया – 20 मार्च 2026 (शुक्रवार) – माँ ब्रह्मचारिणी
🍁तृतीया – 21 मार्च 2026 (शनिवार) – माँ चंद्रघंटा
🍁चतुर्थी – 22 मार्च 2026 (रविवार) – माँ कूष्मांडा –
🍁पंचमी – 23 मार्च 2026 (सोमवार) – माँ स्कंदमाता
🍁षष्ठी– 24 मार्च 2026 (मंगलवार) – माँ कात्यायनी
🍁सप्तमी – 25 मार्च 2026 (बुधवार) – माँ कालरात्रि
🍁अष्टमी – 26 मार्च 2026 (गुरुवार) – माँ महागौरी
🍁नवमी– 27 मार्च 2026 (शुक्रवार) – माँ सिद्धिदात्री + रामनवमी (भगवान राम जन्मोत्सव
(नोट: कुछ जगहों पर चतुर्थी/पंचमी अलग-अलग, लेकिन सामान्यतः 9 दिन पूरे।)
🍁घट स्थापना का शुभ मुहूर्त का समय 🍁
कलश स्थापना के दो प्रमुख शुभ मुहूर्त हैं
प्रतिपदा का मुख्य मुहूर्त (सर्वोत्तम, प्रातःकाल):
19 मार्च सुबह 06:52 बजे से 07:43 बजे तक (मीन लग्न में, लगभग 50 मिनट)
कुछ स्रोतों में विस्तृत: 06:52 AM से 10:10 AM तक (अगर लंबा समय चाहिए)
अभिजीत मुहूर्त (दूसरा शुभ विकल्प): 19 मार्च 2026, दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक
आप इन दोनों शुभ मुहूर्त में घट स्थापना कर सकते हैं और इस त्योहार को मना सकते हैं.।
👉नोट: प्रातःकाल का मुहूर्त सबसे उत्तम है। यदि वैधृति योग या कोई अशुभ हो तो टालें, लेकिन इस वर्ष मुख्य मुहूर्त शुभ हैं। घर में गंगाजल छिड़ककर, साफ-सफाई के साथ कलश स्थापित करें।
👉🍁नवरात्रि में कलश स्थापना का महत्व, विधि और आध्यात्मिक रहस्य 🍁
नवरात्रि का पावन पर्व भारतीय सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह नौ दिनों का उत्सव माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना और शक्ति उपासना का महापर्व है। नवरात्रि की शुरुआत जिस अनुष्ठान से होती है उसे घटस्थापना या कलश स्थापना कहा जाता है।
कलश स्थापना केवल एक साधारण धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसे देवी शक्ति के आवाहन का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों में कलश को सृष्टि, जीवन, समृद्धि और दिव्य शक्तियों का प्रतीक बताया गया है। जब श्रद्धा और विधि से कलश स्थापित किया जाता है तो यह घर में देवी की उपस्थिति का संकेत माना जाता है।
👉🍁 कलश का आध्यात्मिक महत्व
धर्मशास्त्रों में कलश को अत्यंत पवित्र माना गया है। यह ब्रह्मांड की रचना और देव शक्तियों का प्रतीक है। मान्यता है कि कलश में त्रिदेव और देवी शक्ति का निवास होता है।
• कलश के मुख में – भगवान विष्णु का निवास माना जाता है।
• कलश के कंठ (गले) में – भगवान शिव विराजमान माने जाते हैं।
• कलश के आधार (नीचे के भाग) में – भगवान ब्रह्मा का निवास होता है।
• कलश के मध्य भाग में – मातृशक्ति अर्थात देवी दुर्गा का वास माना जाता है।
इसी कारण जब नवरात्रि में कलश स्थापित किया जाता है तो यह केवल एक पात्र नहीं रहता, बल्कि उसमें संपूर्ण देव शक्तियों का आवाहन किया जाता है।
कलश को जल से भरने का भी विशेष महत्व है। जल को जीवन का आधार माना गया है। जल से भरा कलश समृद्धि, पवित्रता और जीवन शक्ति का प्रतीक होता है।
👉🍁घटस्थापना की शास्त्रोक्त विधि
नवरात्रि के पहले दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की जाती है।
🌹स्थान की शुद्धि
सबसे पहले जिस स्थान पर पूजा करनी हो वहाँ अच्छी तरह सफाई करें। उसके बाद गंगाजल का छिड़काव करके उस स्थान को पवित्र करें।
🌹स्नान और संकल्प
नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के समय काले और नीले रंग के वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए। इसके बाद माँ दुर्गा की पूजा का संकल्प लें।
🌹पूजा स्थल की व्यवस्था
पूजा स्थान पर एक चौकी रखें और उस पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएँ। उसी स्थान पर कलश स्थापित किया जाएगा।
🌹जौ बोना
एक मिट्टी के पात्र में स्वच्छ मिट्टी डालें और उसमें जौ बो दें। यह पात्र कलश के पास रखा जाता है।
🌹कलश तैयार करना
एक स्वच्छ मिट्टी या तांबे के कलश में जल भरें। उस जल में गंगाजल, अक्षत (चावल), सुपारी, दूर्वा और कुछ पवित्र पत्ते डालें।
कलश में आम के पत्ते और पानी डालें। कलश पर पानी वाले नारियल को लाल वस्त्र या फिर लाल मौली में बांध कर रखें।
इसमें एक बादाम, दो सुपारी, एक सिक्का और अक्षत जरूर डालें।
👉नोट 🍁 घट या कलश स्थापना के समय ध्यान रखने योग्य बातें
🍁( घटस्थापना के समय ध्यान रखें
कलश स्थापना राहुकाल और गुलिक काल में नहीं करनी चाहिए।
घटस्थापना हमेशा दिन में (सूर्योदय के बाद) की जाती है, रात्रि में नहीं।
यदि प्रतिपदा तिथि सूर्योदय के बाद कम समय के लिए हो तो उसी समय स्थापना करनी चाहिए।)
🌹 कलश को सजाना
कलश के बाहरी भाग में मौली (कलावा) बांधें। इसके बाद कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें।
🌹नारियल स्थापित करना
एक नारियल को लाल कपड़े या लाल मौली में लपेटकर कलश के ऊपर रखा जाता है। नारियल को बहुत शुभ माना जाता है और यह समृद्धि का प्रतीक है।
🌹माँ दुर्गा का आवाहन
धूप और दीप जलाकर माँ दुर्गा का आवाहन करें। कलश पर रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें और माता से घर में निवास करने की प्रार्थना करें।
🌹अखंड दीप का महत्व
नवरात्रि के दौरान पूजा स्थल पर दीपक जलाना बहुत शुभ माना जाता है। कई लोग पूरे नौ दिनों तक अखंड ज्योति भी प्रज्वलित रखते हैं।
अखंड दीपक घर में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और आध्यात्मिक वातावरण को बनाए रखने का प्रतीक है।
👉🍁 नवरात्रि में पूजा की परंपरा
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इसके बाद क्रमशः माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है।
पूजा में देवी को
आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
इसके बाद माता को फल, मिठाई और प्रसाद चढ़ाकर आरती की जाती है।
नवरात्रि के दौरान भक्त दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा, सहस्रनाम, १०८ नाम या अन्य देवी स्तोत्रों का पाठ करते हैं।
👉🍁 कलश स्थापना के लाभ
नवरात्रि में श्रद्धा और भक्ति से कलश स्थापना करने से अनेक आध्यात्मिक और पारिवारिक लाभ प्राप्त होते हैं—
• घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
• देवी दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
• परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
• मनोकामनाओं की पूर्ति का विश्वास बढ़ता है।
• घर का वातावरण पवित्र और आध्यात्मिक बनता है।
👉🍁नवरात्रि वर्ष में कितनी बार आती है
सनातन परंपरा के अनुसार नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है—
चैत्र नवरात्रि
आश्विन (शारदीय) नवरात्रि
माघ गुप्त नवरात्रि
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि
गृहस्थ भक्त मुख्य रूप से चैत्र और शारदीय नवरात्रि को बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाते हैं, जबकि गुप्त नवरात्रि में साधक और संत विशेष साधनाएँ करते हैं।
🙏 जो भी भक्त श्रद्धा, विश्वास और सच्चे मन से नवरात्रि में कलश स्थापना कर माँ दुर्गा की आराधना करता है, उस पर देवी की कृपा अवश्य होती है और उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
कहा जाता है कि शास्त्रों में माँ दुर्गा की पूजा उपासना की बतायी गई विधि से जो कोई अच्छे और सच्चे मन से पूरा करता है उसे नवरात्रि में ज़रूर फल मिलता है.
🍁नवरात्रि में माता के ज्वारे बोने की विधि एवं महत्व 🍁
👉🍁इस बार चैत्र नवरात्रि 2026 में 9 दिन की होगी
ज्वारे विसर्जन नवम दिन 27 मार्च 2026 को होगा 🍁
🌹जौ बोने का महत्व
नवरात्रि में कलश स्थापना के साथ मिट्टी में जौ बोने की परंपरा भी प्राचीन समय से चली आ रही है।
जौ को समृद्धि, उन्नति और कृषि सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है। नौ दिनों तक जौ अंकुरित होकर बढ़ते हैं, जो इस बात का संकेत माने जाते हैं कि आने वाला समय उन्नति और सुख-समृद्धि लेकर आएगा। यदि जौ अच्छे और हरे अंकुरित होते हैं तो इसे शुभ संकेत माना जाता है।
🌹नवरात्रि में माता के ज्वारे बोने की विस्तृत विधि 🌹
नवरात्रि में माता की स्थापना में जौ के ज्वारे बोये जाते हैं। किसी नये मिट्टी के बर्तन में साफ मिट्टी लेकर उसमें अच्छी किस्म के मोटे जौ बिखेर कर उसके ऊपर लगभग आधा इंच मिट्टी की परत बिछा देंवें। पूजा स्थान पर जहां आप कलश की स्थापना करना चाहते हैं, वहां पर चावल की गोलाकार या पुष्प की आकृति बनाकर, उसके ऊपर मिट्टी के बर्तन को स्थापित कर देवें।
नवरात्रि स्थापना के दिन पूजा कै समय उसमें आवश्यकता अनुसार पानी भर देवें। पानी इतना ही भरें जितना मिट्टी सोख लेवे। मिट्टी के ऊपर पानी भरा हुआ नहीं रहना चाहिए। उसके बाद उस बर्तन के बीचो बीच मिट्टी का छोटा नया कलश पानी से भर के रख दें । कलश के ऊपर आम या अशोक के पत्ते चारों तरफ रखते हुए बीच में मोली से बंधा हुआ एक नया नारियल रख देंवें। पूजा में कलश स्थापना के समय इस कलश की यथा विधि पूजा करें।
अगले 3 दिन तक उनमें पानी नही भरें। तीसरे दिन जौ अंकुरित होने लगेंगे। पांचवें- छठे दिन करीब 6 इंच के ज्वारे होने पर उनको कलश के चारों तरफ मोली से बांध देंवें। चौथे -पांचवें दिन से आप थोड़ा थोड़ा जल डाल सकते हैं। वैसे कलश का पानी रिस रिस कर ज्वारों को गीला रखेगा, लेकिन फिर भी कुछ पानी डाल सकते हैं । अष्टमी या नवमी के दिन आपके ज्वारे 9 इंच से लेकर 1 फीट तक की हो सकते हैं।
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के समय बोए गए जौ को अष्टमी व नवमी के दिन विसर्जित करना चाहिए।
1.नवरात्रि पर बोए गए जौ जिस तरह हरियाली लाते हैं, वहीं इनका रंग आपके जीवन में होने वाली चीजों का संकेत देते हैं। अगर जौ का रंग नीचे से आधा पीला और ऊपर से आधा हरा है तो यह इस बात का संकेत है कि आने वाले साल का आधा समय तो आपके लिए अच्छा रहेगा। जबकि बाकी बचे हुए वर्ष में आपको थोड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
2.अगर नवरात्रि में बोए गए जौ सफेद या हरे रंग के उगते हैं तो इसे एक अच्छा संकेत माना जाता है। कहते हैं कि इससे देवी मां की आप पर कृपा होगी और आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी होंगी।
3..मेरे समझ से गेहूं की फसल की बुआई का समय भी
(अक्टूबर - नवम्बर) आश्विन नवरात्र के बाद ही शुरू होता है। इसलिए यह माता जगदंबिका जो प्रकृति या योगमाया / दुर्गा कहलातीं है जो निराकार ब्रहम और सदाशिव / सत्यनारायण की शक्ति है। उसके प्रति सम्मान दिखाने का तरिका है और ज्योति प्रकाश का प्रतीक है कयोंकि ईश्वर उपासना से अंधकार खत्म हो जाता है।
🍁अखंड ज्योति स्थापना।।
बहुत से भक्त नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाते हैं।
यह आवश्यक नहीं अपनी श्रद्धा और व्यवस्था पर
निर्भर करता है।आप चाहें तो केवल सुबह शाम
दीपक जलाकर भी मां की भक्ति कर सकते हैं।
अखंड ज्योति जलाने के लिए आप सबसे पहले यह निश्चित करें कि अखंड दीपक सरसों के तेल का रखना चाहते हैं या गाय के शुद्ध देसी घी का रखना चाहते हैं। घी का दीपक रखने के लिए किसी बड़ी कटोरी में पिघला हुआ घी लेकर रुई की फूल बत्ती से जलाया जाता है। तेल का दीपक मिट्टी के बड़े दीपक में तेल में लंबी रुई की बत्ती से जलाया जाता है।
पूजा स्थान पर जहां आप दीपक की स्थापना करना चाहते हैं, वहां पर चावल की गोलाकार या पुष्प की आकृति बनाकर, उसके ऊपर कटोरी या मिट्टी का दीपक स्थापित कर देवें।
नवरात्रि स्थापना के दिन कलश पूजन के बाद दीपक की भी यथा विधि पूजा की जाती है। घी के दीपक में बत्ती पर काजल नहीं आता। अखंड दीपक के लिए दिन में समय-समय पर उसको संभालते रहें और आवश्यकता अनुसार घी की पूर्ति करते रहें।
आप तेल के दीपक में बत्ती पर काजल आ जाता है अतः समय-समय पर उसको छोटी चिमटी से हटाना पड़ता है। तेल के दीपक में बत्ती के सहारे तेल बाहर भी निकलता रहता है अतः तेल के दीपक के नीचे एक बड़ा खाली कटोरा रखना जरूरी होता है ताकि तेल पूजा स्थान पर नहीं फैले और उस कटोरे में इकट्ठा होता रहे। घी के दीपक के बजाय तेल के दीपक की देखभाल ज्यादा कठिन होती है।
दीपक को हवा से बचाव रखना जरूरी होता है ।यदि पूजा स्थान में हवा आने की संभावना हो तो दीपक को कांच के खुले गोले से ढका जा सकता है। दीपक को रात के समय भी एक दो बार संभाल लेना चाहिए। यदि दीपक की बत्ती बदलना आवश्यक हो तो पहले पुरानी बस्ती से नई बत्ती जला कर उसके बाद पुरानी बत्ती को हटा सकते हैं। ध्यान रखें कि नई और पुरानी दो बत्तीयों में से एक बत्ती लगातार चलती रहे, वरना आपका दीपक अखंड नहीं रह सकेगा।
(इसके साथ ही अखंड ज्योति को चूहों से बचाकर रखने की भी व्यवस्था और सुरक्षा करनी चाहिए।चूहे दीपक की
बत्ती खींच कर ले जाते हैं इससे अप्रिय घटना और हानि की आशंका रहती है।)
पहली बार दीपक को अखंड रखने में असुविधा हो सकती है, लेकिन अगली बार विशेष परेशानी नहीं होती। आशा है उपरोक्त विधि आपके लिए लाभदायक होगी।
🍁 नवरात्रि के नौ दिनों के शुभ रंग
प्रतिपदा – पीला
द्वितीया – हरा
तृतीया – धूसर / ग्रे
चतुर्थी – नारंगी
पंचमी – सफेद
षष्ठी – लाल
सप्तमी – नीला
अष्टमी – गुलाबी
नवमी – बैंगनी / जामुनी
इन रंगों के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है।
👉🌹 अष्टमी-नवमी कन्या पूजन
नवरात्रि में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन (कुमारी पूजन) का विशेष महत्व है।9 कन्याओं को नवदुर्गा का रूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। उन्हें पूड़ी, काले चने
हलवा, का भोग कराया जाता है तथा चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है।
👉🌹 नवरात्रि में क्या नहीं करना चाहिए।
🍁 नवरात्रि में इन बातों का ध्यान रखें
घर में स्वच्छता और सात्विकता बनाए रखें
लहसुन-प्याज और मांसाहार से परहेज करें
क्रोध, झूठ और अपशब्दों से बचें
प्रतिदिन माँ दुर्गा का ध्यान और दीपक अवश्य जलाएँ
👉🌹रामनवमी का महत्व
नवरात्रि का समापन रामनवमी के साथ होता है।
इस दिन भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था, इसलिए दोपहर के समय विशेष पूजा और राम जन्मोत्सव मनाया जाता है।
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