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Nitish Kumar की चुप्पी ने बढ़ाया सस्पेंस राज्यसभा से दूरी या बड़ा राजनीतिक दांव?

राज्यसभा से दूरी या बड़ा राजनीतिक दांव? Nitish Kumar की चुप्पी ने बढ़ाया सस्पेंस

पटना : बिहार की राजनीति एक बार फिर अनिश्चितताओं के भंवर में नजर आ रही है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar के हालिया कदमों ने सियासी गलियारों में नए सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या उन्होंने राज्यसभा जाने का विचार त्याग दिया है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ी और गहरी रणनीति छिपी हुई है?

पिछले कुछ दिनों की घटनाएं सामान्य राजनीतिक व्यवहार से अलग संकेत देती हैं। राज्यसभा चुनाव के दौरान, जब विधानसभा परिसर में मतदान की प्रक्रिया चल रही थी और सभी प्रमुख उम्मीदवार मौजूद थे, उस समय Nitish Kumar वहां अनुपस्थित रहे। इसके बजाय वे अधिकारियों के साथ पटना समाहरणालय के निरीक्षण में व्यस्त दिखे।

इतना ही नहीं, चुनाव परिणाम आने के बाद भी उनकी ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। न सोशल मीडिया पर बधाई संदेश, न मीडिया के सामने कोई बयान, और न ही विजयी उम्मीदवारों से शिष्टाचार मुलाकात—ये तमाम पहलू इस सस्पेंस को और गहरा कर रहे हैं। फिलहाल वे “समृद्धि यात्रा” और प्रशासनिक कार्यक्रमों में सक्रिय हैं, जो यह संकेत देता है कि उनकी प्राथमिकताएं फिलहाल कुछ और हो सकती हैं।

बयान बनाम फैसले: Nitish Kumar की राजनीति का पैटर्न

अगर Nitish Kumar के राजनीतिक करियर पर नजर डालें, तो एक स्पष्ट पैटर्न सामने आता है—उनके बयान और फैसले अक्सर अलग-अलग दिशाओं में चलते नजर आते हैं। एक समय उन्होंने कहा था, “मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाएंगे”, लेकिन बाद में उन्होंने Bharatiya Janata Party के साथ गठबंधन कर सरकार चलाई। इसी तरह, उन्होंने लंबे समय तक Lalu Prasad Yadav और उनके परिवार पर जंगलराज, भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप लगाए, लेकिन बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में Rashtriya Janata Dal के साथ मिलकर सरकार बना ली।

वर्ष 2013, 2017 और 2022 के बीच उनके गठबंधन बदलने के फैसले इस बात के गवाह हैं कि Nitish Kumar की राजनीति परिस्थितियों के अनुसार तेजी से दिशा बदलती रही है। यही वजह है कि उन्हें अक्सर “पलटू चाचा” के नाम से भी संबोधित किया जाता है।

पुराने उदाहरण भी खड़े करते हैं सवाल

राजनीतिक इतिहास के पन्नों में वर्ष 2000 का दौर भी उल्लेखनीय है, जब Nitish Kumar पहली बार मुख्यमंत्री बने। उस समय बेऊर जेल जाकर बाहुबलियों से समर्थन मांगने की घटनाएं चर्चा में रहीं। यह वही नेता हैं जो सुशासन और कानून व्यवस्था को अपनी पहचान बताते हैं, लेकिन समय-समय पर राजनीतिक समीकरणों के तहत अलग-अलग समझौते करते भी नजर आए हैं।

परिवारवाद पर बदला रुख: Nishant Kumar की एंट्री

लंबे समय तक परिवारवाद के खिलाफ मुखर रहने वाले Nitish Kumar के रुख में अब बदलाव दिख रहा है। उनके बेटे Nishant Kumar ने सक्रिय रूप से राजनीति में कदम रख दिया है और Janata Dal (United) की सदस्यता ग्रहण कर ली है। खुद Nishant Kumar ने यह संकेत दिया है कि वे पूरे बिहार का दौरा करेंगे और संगठन को मजबूत करने में भूमिका निभाएंगे। यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि Nitish Kumar अब तक परिवारवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाते रहे हैं।

“जो कहते हैं, वह करते नहीं…”—क्या यह धारणा फिर साबित हो रही है?

राजनीतिक हलकों में एक चर्चित धारणा रही है—
“नीतीश कुमार जो कहते हैं, वह करते नहीं हैं और जो करते हैं, वह कहते नहीं हैं।” राज्यसभा चुनाव के दौरान उनकी चुप्पी, अनुपस्थिति और औपचारिकताओं से दूरी इस धारणा को और बल देती नजर आती है।

आखिर रणनीति क्या है?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या Nitish Kumar वास्तव में राज्यसभा जाने में दिलचस्पी नहीं रखते, या यह किसी बड़े राजनीतिक फेरबदल की तैयारी है? क्या वे फिर से कोई नया सियासी समीकरण गढ़ने वाले हैं?
या यह सिर्फ प्रशासनिक व्यस्तता है, जिसे जरूरत से ज्यादा राजनीतिक रंग दिया जा रहा है?

निष्कर्ष: सस्पेंस बरकरार, नजरें टिकीं अगली चाल पर

फिलहाल जवाब भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि Nitish Kumar की राजनीति एक बार फिर रहस्य और संभावनाओं के मोड़ पर खड़ी है। बिहार की राजनीति में अगला कदम क्या होगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं क्योंकि जब-जब Nitish Kumar चुप रहते हैं, तब-तब बड़े राजनीतिक बदलाव की संभावना और भी प्रबल हो जाती है।

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