असम कांग्रेस में ‘जासूसी राजनीति’ का साया, बैठकों में भरोसे की जगह शक ने ली हर नेता संदेह के घेरे में :-
असम कांग्रेस इन दिनों एक गहरे आंतरिक संकट से गुजर रही है, जहां पार्टी की बैठकों का स्वरूप अब रणनीतिक चर्चा से अधिक ‘जासूसी राजनीति’ जैसा प्रतीत होने लगा है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर ऐसा माहौल बन गया है कि हर नेता दूसरे को शक की नजर से देख रहा है, मानो संगठन के भीतर ही ‘सूचना लीक’ का खेल चल रहा हो। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस की बैठकों में अब खुलकर संवाद करने के बजाय नेता अपनी बात रखने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हैं। यह डर बना हुआ है कि कहीं बैठक में कही गई बातें तुरंत बाहर तक न पहुंच जाएं। यहां तक कि अंदरखाने यह सवाल भी उठने लगा है “क्या सामने बैठा नेता पार्टी के प्रति वफादार है, या फिर वह किसी और को हर जानकारी पहुंचा रहा है?” यह स्थिति ऐसे समय में उभरकर सामने आई है जब असम की राजनीति पहले से ही तेज़ी से बदल रही है और सत्तारूढ़ पक्ष लगातार अपनी पकड़ मजबूत करता नजर आ रहा है। कांग्रेस, जो पहले ही नेतृत्व संकट, गुटबाजी और लगातार हो रहे दल-बदल से जूझ रही है, अब आंतरिक अविश्वास के इस नए संकट से भी घिरती दिख रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक संगठनात्मक समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक कमजोरी का संकेत है। जब किसी पार्टी के भीतर ही विश्वास का ताना-बाना टूटने लगे, तो उसका सीधा असर चुनावी रणनीति, जमीनी संगठन और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ता है। असम कांग्रेस के संदर्भ में यह स्थिति आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रही है।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि यदि कांग्रेस समय रहते इस आंतरिक अविश्वास और ‘सूचना लीक’ की आशंकाओं पर नियंत्रण नहीं कर पाती है, तो इसका सीधा लाभ उसके विरोधियों को मिल सकता है। संगठन के भीतर एकजुटता की कमी और नेतृत्व के प्रति घटता भरोसा चुनावी परिणामों को भी प्रभावित कर सकता है। हालांकि, पार्टी की ओर से आधिकारिक तौर पर इस तरह की किसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर जो संकेत मिल रहे हैं, वे यह स्पष्ट करते हैं कि असम कांग्रेस के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व इस ‘जासूसी जैसे माहौल’ को समाप्त कर विश्वास बहाली की दिशा में क्या कदम उठाता है।