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हिन्दू नववर्ष : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप

हिन्दू नववर्ष : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप
-एस० एस० धाकड़,
-बरेली, जिला रायसेन (म० प्र०)
हिन्दू नववर्ष भारतीय सभ्यता की प्राचीन कालगणना पर आधारित वह महत्त्वपूर्ण परम्परा है, जिसका सम्बन्ध केवल वर्ष परिवर्तन से नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म और सामाजिक जीवन की निरन्तरता से है। भारतीय कालगणना की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है और इसका आधार वेद, पुराण, ज्योतिष तथा स्मृति ग्रन्थों में वर्णित समय-निर्धारण पद्धति पर आधारित है। हिन्दू नववर्ष का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है, जिसे भारतीय पंचांग में वर्ष का प्रथम दिन स्वीकार किया गया है। यह तिथि वसन्त ऋतु के आगमन के साथ जुड़ी हुई है, इसलिए इसे प्रकृति के नवजीवन और सृष्टि के पुनरारम्भ का प्रतीक माना जाता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय कालगणना में अनेक संवतों का प्रचलन रहा है, जिनमें विक्रम संवत्, शक संवत्, कलियुग संवत् आदि प्रमुख हैं। इनमें विक्रम संवत् का विशेष स्थान है, जिसका सम्बन्ध प्राचीन भारतीय सम्राट विक्रमादित्य से जोड़ा जाता है। परम्परा के अनुसार उनकी विजय के उपलक्ष्य में इस संवत् का प्रचलन हुआ और इसका आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना गया। भारतीय समाज में यह संवत् धार्मिक अनुष्ठानों, पर्व-त्योहारों और सामाजिक कार्यों में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिन्दू नववर्ष केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि भारतीय ऐतिहासिक परम्परा का भी अभिन्न अंग है।
सांस्कृतिक दृष्टि से हिन्दू नववर्ष भारत की विविधता में एकता का प्रतीक है। देश के विभिन्न प्रदेशों में यह अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, परन्तु इसकी मूल भावना समान रहती है। उत्तर भारत में इसे नवसंवत्सर कहा जाता है, महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिंधी समाज में चेटीचंड के रूप में इसका उत्सव मनाया जाता है। इन सभी रूपों में घर की शुद्धि, पूजा-अर्चना, पंचांग श्रवण, ध्वज स्थापना तथा मंगल कार्यों का आरम्भ किया जाता है। यह परम्परा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति में नववर्ष को शुभारम्भ, नवचेतना और धर्मपालन का प्रतीक माना गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना का प्रारम्भ किया था, इसलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिवस माना जाता है। अनेक पुराणों में यह भी वर्णित है कि चैत्र मास से ही देवपूजन, व्रत और नवरात्रि जैसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों का आरम्भ होता है। इस कारण हिन्दू नववर्ष का सम्बन्ध केवल सामाजिक उत्सव से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय परम्परा में समय को ईश्वर का स्वरूप माना गया है, इसलिए वर्ष का आरम्भ भी शुभ तिथि से ही किया जाता है।
प्राकृतिक दृष्टि से भी यह समय वर्षारम्भ के लिए अत्यन्त उपयुक्त माना गया है। चैत्र मास में वसन्त ऋतु अपने सौन्दर्य पर होती है, वृक्षों में नये पत्ते आते हैं, फसलें पकती हैं और वातावरण में संतुलन रहता है। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति के इस परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए वर्ष का आरम्भ इसी समय से निर्धारित किया। इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दू नववर्ष की परम्परा केवल धार्मिक आस्था पर आधारित नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और प्राकृतिक विचार पर भी आधारित है।
इस प्रकार हिन्दू नववर्ष का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप भारतीय सभ्यता की प्राचीनता, निरन्तरता और समन्वय की भावना को प्रकट करता है। यह परम्परा हमें यह सन्देश देती है कि प्रत्येक नया वर्ष केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन में नये संकल्प, नयी चेतना और नये कर्तव्य का आरम्भ है। भारतीय संस्कृति में नववर्ष का स्वागत इसी भाव से किया जाता है कि मनुष्य धर्म, प्रकृति और समाज के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए नये उत्साह के साथ जीवन को आगे बढ़ाये।

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