रिश्तों की ढहती दीवारें: संस्कार, संस्कारवान और समय की पुकार ।
"जड़ काटें जिस वृक्ष की, उसकी छांव न कोई, जो मां-बाप विसारिया , सुखी कभी न होय" ।
"भारत"—वह भूमि जहाँ पत्थरों में भी प्राण फूँकने की परंपरा रही है। वह देश जिसकी मिट्टी की खुशबू में 'मर्यादा' और 'सेवा' रची-बसी थी। जिस आंगन में "मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम" ने पिता के एक वचन के लिए राजसी वैभव को तिनके के समान त्याग दिया और जहाँ "माता सीता" ने महलों की सुकुमारता छोड़ काँटों भरी राहों को चुना, आज उसी देश के आँगन सूने पड़ रहे हैं।
आज के इस चकाचौंध भरे युग में हम एक ऐसी गहरी खाई की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ विकास की परिभाषा तो बदल गई है, लेकिन विनाश की आहट हमारे अपनों के ही कदमों से सुनाई दे रही है।
आज माता-पिता अपने बच्चों को "इंसान" बनाने से ज्यादा "मशीन" बनाने की होड़ में लगे हैं। हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा सबसे ज्यादा पैसा कमाए, सबसे ऊँचे पद पर हो, लेकिन इस दौड़ में हम उसे "भावनात्मक बोध" देना भूल जाते हैं। परिणाम?
जो बच्चा बुढ़ापे की लाठी होना चाहिए था, वह धन के लोभ में विदेश या बड़े शहरों की ओर ऐसा पलायन करता है कि पीछे रह जाते हैं सिर्फ बूढ़े माँ-बाप और उनकी सिसकती तन्हाई।
कितनी विडंबना है कि जिस घर को माँ-बाप ने एक-एक ईंट जोड़कर बनाया, आज उसी घर के किसी कोने में उनकी लाश सड़ जाती है और पड़ोसियों को बदबू आने पर पता चलता है।
जहां एक जानवर भी अपनी माँ की मृत्यु पर आंसू बहाता फिर क्या हम, जो स्वयं को श्रेष्ठ प्राणी कहते हैं, इतने संवेदनहीन कैसे हो गए ?
कल तक वृद्धाश्रम केवल शहरों की मजबूरी माने जाते थे, पर आज ये गाँवों की दहलीज तक पहुँच चुके हैं। यह हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। बुजुर्ग कोई बोझ नहीं, बल्कि हमारे जीवन की "जीवंत विरासत" हैं। जब हम उन्हें घर से निकालते हैं, तो दरअसल हम अपनी जड़ों को ही काट रहे होते हैं।
"जिस घर में बड़ों का सम्मान नहीं होता, उस घर की बरकत और शांति रेत के महल की तरह ढह जाती है।"
यहां दो पीढ़ियों के बीच का सेतु के समझ और समन्वय को भी समझना जरूरी है ।
सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि समय के साथ रिश्तों के समीकरण बदले हैं। आज की युवा पीढ़ी अपनी मेहनत और अनुभव से अपनी पहचान बनाती है। वे अपनी 'निजता' (Privacy) को लेकर सजग हैं। जब घर के बुजुर्ग छोटी-छोटी घरेलू बातों या पति-पत्नी के बीच की नोंक-झोंक को पड़ोसियों या रिश्तेदारों में साझा करते हैं, तो नई पीढ़ी में असहजता और तनाव पैदा होता है।
यहाँ दोनों पक्षों को आत्ममंथन की आवश्यकता है ।
बुजुर्गों को ये समझना होगा कि परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। आज के बच्चे भारी तनाव और प्रतिस्पर्धा के बीच जी रहे हैं। हर बात को आत्मसम्मान से जोड़कर देखना या बच्चों के निजी जीवन में अत्यधिक हस्तक्षेप करना दूरियाँ बढ़ाता है।
वही दूसरी ओर युवाओं के लिए उन्हें यह याद रखना चाहिए कि आज वे जो बीज बो रहे हैं, कल वही वृक्ष बनकर उन्हें भी छाया या काँटे देंगे। आज के बच्चे ही कल के बुजुर्ग होंगे।
यदि हमें शांति और सुकून चाहिए, तो हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर की ओर वापस लौटना होगा।
"श्रीमद्भगवद्गीता" और "रामायण" केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं।
"आध्यात्मिकता" हमें धैर्य और संतोष सिखाती है।
यह हमें सिखाती है कि 'विकास' वह नहीं जो केवल बैंक बैलेंस बढ़ाए, बल्कि वह है जो 'आत्मा' को संतुष्टि दे।
आइए, हम एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ें। बुजुर्गों को उनके अनुभव का सम्मान दें और युवा पीढ़ी को उनकी मेहनत का श्रेय।
जब घर में प्रेम का दीया जलेगा, तभी समाज और राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल होगा।
"याद रखें, विकास की ऊँची इमारत तभी टिकती है जब उसकी नींव (हमारे बुजुर्ग) मजबूत और सम्मानित हो।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT