हरीश राणा - कौन बेहतर" जिंदगी या मौत "?
कल्पना कीजिए… एक ऐसा जीवन जहाँ धड़कन तो चल रही हो, पर एहसास मर चुके हों। आँखें खुली हों, पर उनमें कोई सपना न हो। शरीर इस दुनिया में हो, पर आत्मा जैसे किसी अनंत अंधेरे में भटक गई हो। हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से उसी अंधेरे में कैद थे — एक ऐसे सन्नाटे में, जहाँ न आवाज़ पहुँचती है, न स्पर्श, न अपनों की पुकार।
तेरह साल… सोचिए, कितनी सुबहें आई होंगी जब माँ ने उनके माथे को सहलाया होगा, कितनी रातें बीती होंगी जब परिवार ने उनकी उँगलियों में हलचल ढूँढी होगी। हर त्योहार पर एक उम्मीद जगी होगी — शायद इस बार चमत्कार हो जाए। लेकिन चमत्कार भी जैसे रास्ता भूल गया था। मशीनों की धीमी-धीमी आवाज़ों के बीच उनका अस्तित्व बस साँसों तक सिमट गया था। न हँसी, न आँसू, न शिकायत… बस एक लंबा, अंतहीन इंतज़ार।
अब देश की सबसे बड़ी अदालत, Supreme Court of India, ने उनके लिए एक ऐसा फैसला सुनाया है जो कानून की किताबों से निकलकर सीधे इंसानियत के दिल तक पहुँचता है। “गरिमामयी मृत्यु” — कितना गहरा शब्द है यह। जैसे कोई कह रहा हो कि अब दर्द की बेड़ियाँ खोल दी जाएँगी, अब उस शरीर को मुक्त कर दिया जाएगा जो वर्षों से केवल सह रहा था।
उन्हें All India Institute of Medical Sciences में शिफ्ट किया गया है। डॉक्टरों की एक विशेष टीम उनके अंतिम सफर की तैयारी कर रही है — कितना अजीब है न, जहाँ अस्पतालों में जिंदगी बचाने की जंग लड़ी जाती है, वहीं अब एक शांत, सम्मानजनक विदाई की तैयारी हो रही है। कोई ज़हर नहीं, कोई अचानक अंत नहीं… बस धीरे-धीरे उन सहारों को हटा लिया जाएगा जिनसे साँसें बंधी थीं। और फिर एक दिन, शायद कुछ हफ्तों बाद, वह सन्नाटा सचमुच शांत हो जाएगा।
कहते हैं इंसान उम्मीद पर जीता है। लेकिन जब उम्मीद ही तेरह साल तक पत्थर बनी रहे, तब वह उम्मीद नहीं, एक अनंत पीड़ा बन जाती है। परिवार ने यह निर्णय पत्थर दिल होकर नहीं, बल्कि टूटे हुए दिल के साथ लिया है। हर दस्तखत में एक चीख दबी होगी, हर सहमति में एक माँ की सिसकी, एक पिता का काँपता हाथ, एक भाई की बुझती आँखें।
यह कहानी हमें Aruna Shanbaug की याद भी दिलाती है — वह लंबा इंतज़ार, वह अनसुनी पुकार, वह बिस्तर से बँधा हुआ जीवन। सवाल आज भी वही है — क्या सिर्फ साँस लेना ही जीवन है? क्या बिना चेतना, बिना अनुभूति के सालों तक पड़े रहना जीना कहलाता है? या फिर कभी-कभी मृत्यु ही सबसे बड़ी करुणा बन जाती है?
हरीश राणा अब शायद सुन नहीं सकते, समझ नहीं सकते… लेकिन देश उनके लिए दुआ कर रहा है। दुआ कि यह विदाई शांत हो, कोमल हो, दर्द से परे हो। दुआ कि तेरह साल का सन्नाटा अब शांति में बदल जाए। दुआ कि जिस आत्मा ने इतने वर्षों तक एक निर्जीव शरीर में कैद रहकर सब सहा, वह अब मुक्त होकर कहीं उजाले में चली जाए।
कुछ कहानियाँ आँसू बनकर ही पूरी होती हैं… और हरीश की कहानी भी शायद उसी आख़िरी आँसू के साथ पूर्ण होगी — जहाँ दर्द समाप्त होगा, और एक लंबी, थकी हुई आत्मा को आखिरकार सुकून मिल जाएगा।