तो आखिर विश्वास किस पर किया जाए?सरकार से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ऐसी परिस्थितियाँ बन जाएँ कि आम नागरिक का रोजगार ही छिन जाए, उसे बेरोजगारी के कटघरे
क्या अपने हिंदुस्तान में किसी राजनीतिक पार्टी पर विश्वास किया जा सकता है?*
यदि इस देश में सरकार से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ऐसी परिस्थितियाँ बन जाएँ कि आम नागरिक का रोजगार ही छिन जाए, उसे बेरोजगारी के कटघरे में खड़ा कर दिया जाए, और लाखों लोग भुखमरी के कगार पर पहुँच जाएँ — तो आखिर विश्वास किस पर किया जाए?
बीते वर्षों में जो घटनाएँ सामने आईं, उन्होंने आम जनमानस, विशेषकर सहारा से जुड़े लाखों कार्यकर्ताओं के मन में गहरी पीड़ा और असमंजस पैदा किया है। पूर्व सरकार के समय में सरकारी संस्था SEBI के माध्यम से एक विकसित होते परिवार और उसके जमाकर्ताओं पर गंभीर आरोप लगाए गए — कि उनकी जमा राशि अवैध है, काला धन है। लेकिन 14 वर्षों के लंबे समय में भी ये आरोप स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं हो पाए।
इसके बाद 2020 में सहकारिता मंत्रालय का गठन हुआ और 2022 से CRCS के माध्यम से कार्यप्रणाली पर ऐसी रोक लगी, जिससे लाखों कार्यकर्ताओं का रोजगार ठप हो गया। जो लोग अपने परिवार का पालन-पोषण इसी कार्य से कर रहे थे, वे अचानक असहाय और बेरोजगार हो गए।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन परिस्थितियों का जिम्मेदार कौन है?
क्या पूर्व सरकार, जिसने संस्था को कठघरे में खड़ा किया?
या वर्तमान व्यवस्था, जिसने कार्य को रोककर लाखों लोगों की आजीविका छीन ली?
*सहारा कार्यकर्ता आज सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं —*
*हम कब तक इंतजार करें? हमारा रोजगार कब बहाल होगा?*
“सबका साथ, सबका विकास” का नारा तभी सार्थक होगा, जब हर व्यक्ति को न्याय और रोजगार दोनों मिलेंगे। आज आवश्यकता है कि सरकार इन लाखों परिवारों की वेदना को समझे, उनकी स्थिति पर संवेदनशीलता के साथ विचार करे और जल्द से जल्द कोई ठोस समाधान निकाले।
*यह सिर्फ एक संस्था का सवाल नहीं है, यह लाखों परिवारों के भविष्य का प्रश्न है।*