अन्नदाता की व्यथा: भारतीय कृषि की चुनौतियाँ और समाधान का मार्ग ।
"जब किसान समृद्ध होगा, तभी भारत वास्तव में आत्मनिर्भर होगा।"
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की लगभग 50% आबादी अपनी आजीविका के लिए मिट्टी से जुड़ी है। देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 17-18% है और 10 करोड़ से अधिक परिवार इस व्यवसाय से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। लेकिन आज़ादी के 78 वर्षों बाद भी, जिस क्षेत्र को देश की 'रीढ़ की हड्डी' कहा जाता है, उसकी स्थिति अत्यंत दयनीय है।
"भारत कितना भी डिजिटल क्यों न हो जाय रोटी गूगल से नहीं मिलेगी" ।
आज का युवा खेती को 'नीच' नज़र से देखता है और 'व्हाइट कॉलर जॉब' की तलाश में शहरों की ओर भाग रहा है। इसका मुख्य कारण वह संघर्ष है जो एक किसान रोज़ाना झेलता है। सरकारें आती-जाती हैं, वोट बैंक की राजनीति के लिए 'अनुदान' (Subsidy) और 'मुफ्त बिजली' जैसे प्रलोभन दिए जाते हैं, लेकिन किसान के जीवन स्तर में कोई वास्तविक सुधार नहीं दिखता।
इसके पीछे कुछ प्रमुख समस्याएँ है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है
बढ़ती लागत और घटती आय जैसे बीज, खाद और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, जबकि फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
दूसरी बात है कि बुनियादी ढांचे का अभाव है बिहार जैसे राज्यों में बंपर पैदावार (जैसे आलू) होने पर भी कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स न होने के कारण फसल सड़कों पर फेंकनी पड़ती है।
तीसरी बात बिचौलियों और पैक्स (PACS) की विफलता है जो सरकारी खरीद प्रणालियाँ अक्सर कागजों तक सीमित रहती हैं। समय पर खरीद न होने से फसल किसानों के खलिहानों में ही सड़ जाती है।
छोटी जोत और चकबंदी का न होना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है ज़मीन का टुकड़ों में बँटा होना आधुनिक खेती में बड़ी बाधा है।
केवल वादे नहीं, ज़मीनी बदलाव की ज़रूरत
सिर्फ नकद पैसे बांटने से किसानों का भला नहीं होगा; इसके लिए ठोस नीतिगत बदलाव और 'सप्लाई चेन' को दुरुस्त करने की आवश्यकता है।
सुदृढ़ मंडी व्यवस्था और उचित मुआवजा सरकार को ऐसी मंडियों का निर्माण करना चाहिए जहाँ किसानों को उनकी फसल का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के आधार पर तुरंत और सीधे उनके खाते में मिले। बिचौलियों की भूमिका को खत्म करना अनिवार्य है।
फसल विनिमय और परिवहन (Agri-Logistics), भारतीय रेलवे का उपयोग "कृषि हब" कनेक्ट करने के लिए किया जाना चाहिए।
जैसे दक्षिण भारत का नारियल उत्तर भारत पहुँचे। और बिहार का अधिशेष आलू उन राज्यों में जाए जहाँ इसकी कमी है।
इससे न तो फसल बर्बाद होगी और न ही किसानों को घाटा होगा।
अनुदान के बजाए बुनियादी ढांचे पर निवेश करना जरूरी है
मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटने के बजाय उस पैसे का उपयोग गाँव-गाँव में कोल्ड स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग यूनिट और बेहतर सड़कों के निर्माण में होना चाहिए। जब किसान की फसल खराब नहीं होगी, तो उसकी सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) खुद-ब-खुद बढ़ जाएगी।
किसानों के लिए एक ऐसा "साझा मंच" होना चाहिए जहाँ वे अपनी समस्याओं का त्वरित समाधान पा सकें। पैक्स (PACS) जैसी संस्थाओं को भ्रष्टाचार मुक्त कर पारदर्शी बनाना होगा ताकि सस्ते बीज और खाद वास्तव में छोटे किसानों तक पहुँचें।
कृषि केवल एक पेशा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। जब तक राजनेता किसानों को सिर्फ 'वोट बैंक' समझेंगे और अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाकर किसानों के बच्चों को बदहाली में छोड़ेंगे, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। हमें खेती को एक "लाभकारी व्यवसाय" (Profitable Business) और "सम्मानजनक करियर" के रूप में पुनर्जीवित करना होगा।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT