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जन्मदिन विशेष: पूरबी सम्राट महेन्दर मिसिर — लोकसंगीत से स्वतंत्रता चेतना तक

(✒️ हरिदयाल तिवारी)

भोजपुरी संस्कृति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनकी पहचान केवल साहित्य या संगीत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे अपने समय की सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के भी प्रतीक बन जाते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्व थे पूरबी सम्राट महेन्दर मिसिर।

16 मार्च 1865 को सारण (छपरा) जिले के मिश्रवलिया गांव में जन्मे महेन्दर मिसिर ने भोजपुरी लोकसंगीत को नई ऊँचाई दी। उन्होंने पूरबी शैली के अनेक गीत रचे और भोजपुरी समाज की भावनाओं—प्रेम, विरह, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं—को अपने गीतों में सजीव रूप दिया। उनके गीत आज भी भोजपुरी लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। 🎶

लेकिन महेन्दर मिसिर का व्यक्तित्व केवल एक लोककवि या गवइया तक सीमित नहीं था। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ भी दिखाई देता है। कई ऐतिहासिक संदर्भों और लोकस्मृतियों में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे क्रांतिकारियों की सहायता की।

कहा जाता है कि उन्होंने गुप्त रूप से नकली मुद्रा छापकर क्रांतिकारियों और उनके परिवारों को आर्थिक सहयोग दिया, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती मिल सके। यह कार्य अत्यंत जोखिम भरा था और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष चुनौती जैसा था। बाद में अंग्रेजी प्रशासन को इसकी जानकारी भी मिली और उनके विरुद्ध कार्रवाई की गई।

हालाँकि एक लोकप्रिय धारणा यह भी सुनने में आती है कि उन्हें फाँसी दी गई थी, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार यह सही नहीं है। उनका निधन 26 अक्टूबर 1946 को हुआ था।

महेन्दर मिसिर का जीवन इस बात का उदाहरण है कि लोकसाहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह समाज की चेतना, संघर्ष और आत्मसम्मान का भी दर्पण होता है। उनके गीतों में भोजपुरी समाज की आत्मा बोलती है, और उनका जीवन यह दिखाता है कि कला और राष्ट्रप्रेम साथ-साथ चल सकते हैं।

आज उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करना केवल एक महान लोककवि को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि भोजपुरी संस्कृति की उस समृद्ध परंपरा को सम्मान देना भी है, जिसने लोकजीवन को आवाज दी और समाज को अपनी जड़ों से जोड़कर रखा।

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